माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनंदननाथजी का जन्म एवं तप कल्याणक है। भगवान का जन्म और तप कल्याणक लेकर देश भर के सिद्ध और अतिशय तीर्थ क्षेत्र सहित जिनालय और चैत्यालयों में अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और अन्य धार्मिक विधान होंगे। इस दिन जैन समाज के लोग भक्ति भाव से प्रभु की मंगल आराधना करते हैं। श्रीफल जैन न्यूज जैन श्रद्धालुओं के लिए भगवान अभिनन्दननाथ जी से जुड़ी जानकारी संजोकर लाया है। आप भी पढ़िए यह उप संपादक प्रीतम लखवाल की स्पेशल रिपोर्ट…
इंदौर। जैन धर्म के चौथे तीर्थंकर भगवान अभिनंदननाथ हैं। 9 फरवरी माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनंदननाथजी का जन्म और तप कल्याणक दोनों है। पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म से पूर्व श्री अभिनंदननाथ भगवान विजय नाम के अनुत्तम विमान से गर्भ में आए और वह दिन वैशाख छठ था। जैन धर्म के पुराणों के अनुसार भगवान अभिनंदन नाथ ने भगवान माघ शुक्ल द्वादशी को पुनर्वसु नक्षत्र में जन्म लिया। ज्ञात सा्रोतों के अनुसार भगवान अभिनंदननाथ का कुमार काल साढ़े 12 लाख वर्ष पूर्व का है। उन्होंने साढ़े 36 लाख वर्ष पूर्व अथवा 8 पूर्वांग तक राज्य किया। इस दिन जैन समाज के लोग भक्ति भाव से भरे हुए उनका पूजन, अभिषेक और शांतिधारा सहित अन्य मंगल आराधना करते हैं। उन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई प्रांतों और देशों में तीर्थाटन किया। इनसे पूर्व तीर्थंकर संभवनाथजी भगवान थे।
स्वर्ण वर्ण के भगवान का है अद्भुत स्वरूप
भगवान अभिनंदननाथ जी को अभिनंदन स्वामी के नाम से भी जाना जाता है। अभिनंदननाथ स्वामी का जन्म इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में माघ मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को हुआ था। अयोध्या में जन्मे अभिनंदननाथ जी की माता सिद्धार्था देवी और पिता राजा संवर थे। इनका वर्ण सुवर्ण और चिह्न बंदर था। इनके यक्ष का नाम यक्षेश्वर और यक्षिणी का नाम व्रज श्रृंखला था। अपने पिता की आज्ञा से अभिनंदननाथ जी ने राज्य का संचालन भी किया, लेकिन उनका सांसारिक जीवन से मोह भंग हो गया। भगवान अभिनंदननाथ का पूर्व पर्याय में नाम महावल राजा था। वे मंगलावती देश के राजा थे तथा पूर्व पर्याय में रत्न संचयपुर नगर के राजा रहे थे। उनके पूर्व पर्याय के पुत्र श्री धनपाल जी थे। उन्होंने पूर्व पर्याय में विमल वाहन नाम के मुनिराज से दीक्षा ग्रहण की।
भगवान का वैराग्य
यहां ग्रंथों में वर्णित सुस्पष्ट जानकारी के अनुसार भगवान अभिनंदननाथ जी को गंधर्व नगर का नाश देखकर वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने माघ शुक्ल 12 को दीक्षा ग्रहण की। यह दीक्षा भी भगवान अभिनंदननाथ जी ने पुनर्वसु नक्षत्र में ग्रहण की।
तीर्थंकर अभिनंदननाथ की संक्षिप्त जानकारी
ऐतिहासिक काल 1× 10223 वर्ष पूर्व
पूर्व तीर्थंकर- संभवनाथ
अगले तीर्थंकर- सुमतिनाथ
गृहस्थ जीवन
वंश- इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय
पिता- श्री संवर राजा
माता- श्री सिद्धार्था देवी
पंच कल्याणक
च्यवन स्थान- विजय नाम के अनुत्तम विमान से
जन्म कल्याणक- माघ शुक्ल द्वादशी
जन्म स्थान- अयोध्या
दीक्षा कल्याणक- माघ शुक्ल द्वादशी
दीक्षा स्थान-अयोध्या
केवल ज्ञान कल्याणक- पौष शुक्ल 14
केवल ज्ञान स्थान- अयोध्या
मोक्ष- वैशाख शुक्ल 7
मोक्ष स्थान- सम्मेद शिखर
रंग-स्वर्ण
ऊंचाइ-350 धनुष (1050 मीटर)
आयु- 5000000 पूर्व (352.8× 1018 वर्ष)
वृक्ष- शाल्मली
शासक देव
यक्ष- ईश्वर
यक्षिणी- काली
गणधर
प्रथम गणधर- वज्रानाभी
गणधरों की संख्या- 103













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