मुनि 108 श्री मुमुक्षु सागर जी महाराज के सानिध्य में धारियावाद में भव्य मंगल कार्यक्रम होंगे। मुनिश्री 6 दिसंबर को यहां मंगल प्रवेश करेंगे। वे मुनि दीक्षा के बाद पहली बार आ रहे हैं। पढ़िए धारियावाद से अशोक कुमार जेतावत की खबर…
धरियावद। वात्सल्य वारिधि दिगंबर जैन आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर जी महाराज से दीक्षित एवं संघस्थ मुनि 108 श्री प्रभव सागर जी महाराज, मुनि 108 श्री दर्षित सागर जी महाराज और धरियावद नगर एवं पचौरी परिवार के गौरव मुनि 108 श्री मुमुक्षु सागर जी महाराज ससंघ का यहां मंगल प्रवेश 6 दिसंबर शुक्रवार को सुबह होगा। यह पहला अवसर है जब श्री मुमुक्षु सागर महाराज मुनि दीक्षा के बाद पहली बार अपने गृह नगर धरियावद आ रहे हैं।
पारसोला से विहार कर आए मुनिश्री
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के संघस्थ तीनों दिगंबर जैन मुनि, गुरु आज्ञा से 30 नवंबर को पारसोला से विहार कर धरियावद में आगामी 6 से 8 दिसंबर तक होने वाले अनंत व्रत उद्यापन समारोह में सान्निध्य एवं आशीर्वाद प्रदान करने शनिवार को शाम को मऊ अतिशय क्षेत्र पर विराजमान हुए।
प्रतिदिन हो रहे विविध विधान
मुनि संघ सान्निध्य में क्षेत्र पर प्रतिदिन श्रीजी का जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक, महाशांति धारा प्रवचन सभा, आहार चर्या, संघ की सामायिक, स्वाध्याय, आरती, भक्ति, गुरुवंदना, वैयावृति आदि हो रहे हैं। इसमें धरियावद एवं आसपास के कई श्रद्धालु भक्तिभाव से भाग ले रहे हैं।
धर्म को अपने आचरण में धारण करें: मुनिश्री मुमुक्षु सागरजी,
मुनि 108 श्री मुमुक्षु सागर जी महाराज ने मऊ अतिशय क्षेत्र में रविवार को आयोजित धर्मसभा में कहा कि एक तिर्यंच प्राणी नियम एवं संयम लेकर व्रत का पालन करते हुए अपने जीवन को समाप्त कर लेता है। हम तो मनुष्य जन्म लेकर सांसारिक शरीर के भोग में लगे हुए हैं। हमें मनुष्य जन्म अति दुर्लभता से प्राप्त हुआ है। इसके संयम, व्रत एवं नियम के साथ पालन करना चाहिए। मनुष्य जन्म में भी हमें जैन कुल में देव, शास्त्र और गुरु का सान्निध्य मिला है। इसलिए हमें व्रत, संयम और नियम लेकर कर्मों की निर्जरा करनी चाहिए। प्रत्येक जीव को अपना चिंतन बोध करना चाहिए।
भोग में आसक्ति न रखें
मुनिश्री ने कहा कि शास्त्र पढ़े, मालाएं जपीं, पूजा-पाठ किया, लेकिन मन परिवर्तित नहीं हुआ। अगर धर्म को अपने आचरण में धारण नहीं किया, तो पूजा-पाठ का क्या फायदा। भोग भोगना बुराई नहीं है, लेकिन उसमें आसक्ति रखना बुरी बात है।
कल्याण के मार्ग पर बढ़ने का संदेश
मुनि मुमुक्षु सागर जी महाराज ने अपने गृहस्थ जीवन के अनुभवों को सुनाते हुए कहा कि उन्होंने अपने घर, परिवार, समाज के व्यवहार को बहुत करीब से अनुभव किया, तो वह बहुत दुखी हुए। इसलिए वे राग-द्वेष, मोह के जंजाल से मुक्त होकर वैराग्य पथ पर अग्रसर हुए हैं। उन्होंने अपने बचपन के साथियों को प्रेरणा देते हुए कहा कि हम और आप सभी खेले, खूब खाया-पिया, मौज-मस्ती की। इसमें कोई सार नहीं दिखा, तो मैंने वैराग्य पथ को धारण कर लिया। मुनिश्री ने लोगों को चिंतन-मनन कर आत्मा के कल्याण के मार्ग पर बढ़ने का संदेश दिया।
धर्मसभा में ये महानुभाव रहे मौजूद
धर्मसभा में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रतिष्ठाचार्य पंडित हंसमुख जैन, दसा हुमड़ समाज धरियावद के श्रेष्ठी करणमल सेठ, प्रतिष्ठाचार्य पंडित विशाल जैन, मऊ अतिशय क्षेत्र कमेटी के इंदरमल दोषी, बदामीलाल डागरिया, श्रेणिक दोषी, दिलीप डागरिया, पवन जोदावत, विजेंद्र सरिया, अशोक कुमार जेतावत, सुनील भोपावत समेत अन्य श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे। मंगलाचरण ईश्वर पचौरी ने किया।













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