अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में बहुत सारा ऐसा वातावरण बनता है कि हम अवसाद, तनाव में आ जाते हैं। अवसाद शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दुखों को देने वाला होता है। उस समय व्यक्ति को कुछ समझ नहीं पड़ता है और वह अपनी अच्छाई और बुराई को भी जान नहीं पाता। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के धर्म प्रभावना रथ का पांचवां पड़ाव श्री 1008 पदम प्रभु दिगंबर जैन मंदिर, वैभव नगर में चल रहा है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 12 दिवसीय वृहद भक्तामर महामंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है।
विधान के छटवे दिन, मुख्य पुण्यार्जक मोतीलाल, ऋषभ कुमार, संचित जैन परिवार और सातवें दिन, मुख्य पुण्यार्जक शकुंतला जैन, नितेश प्रिया जैन परिवार और 12 दिवसीय सौधर्म इन्द्र संजय सीमा जैन ने दोनो दिन मिलाकर भक्तामर काव्य के 21, 22, 23, 24, 25, 26, 27 और 28 काव्य की आराधना करते हुए कुल 448 अर्घ्य समर्पित किए। अब तक इस आयोजन में कुल 1568 अर्घ्य समर्पित किए जा चुके हैं।
इस विशेष अवसर पर छटवे दिन के शान्तिधारा का लाभ मोतीलाल, ऋषभ, संचित, सम्मेद, रियांश, कुसुम, सुनीता, राखी, मेघा, निलेश जैन परिवार को प्राप्त हुआ। दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य मुख्य पुण्यार्जक परिवार को मिला। शास्त्र भेंट का लाभ मोतीलाल, ऋषभ, संचित जैन और संध्या जैन परिवार को मिला।
सातवे दिन के शान्तिधारा का लाभ आशीष, अर्चना, अनोखी, आर्जव, अनाया, सतभैया बीना वाले परिवार को प्राप्त हुआ। दीप प्रज्वलन, चित्रानावरण और मुनि श्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य मुख्य पुण्यार्जक परिवार को मिला। शास्त्र भेंट का लाभ पी.सी. जैन और सीमा जैन परिवार को मिला।
अवसाद, तनाव एक जहर
इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में बहुत सारा ऐसा वातावरण बनता है कि हम अवसाद, तनाव में आ जाते हैं। अवसाद शारीरिक, मानसिक और आर्थिक दुखों को देने वाला होता है। उस समय व्यक्ति को कुछ समझ नहीं पड़ता है और वह अपनी अच्छाई और बुराई को भी जान नहीं पाता।
इसको हमें एक उदाहरण से देख सकते हैं एक व्यक्ति संत के पास गया और संत से कहा कि हे गुरुदेव मुझे एक तनाव होता है, वह खत्म नहीं होता और दूसरा तनाव आ जाता है तो उसके लिए क्या किया जाए तो गुरुदेव ने कहा कि तुम आज की रात यहीं रुको।
कल सुबह मैं तुमको बताता हूं फिर उन्होंने रात को उसे कहा कि यहां पर 100 ऊंट हैं। उन ऊंटों को तुम्हें बिठाना है और फिर तुम सुबह मेरे पास आना। वह पूरी रात इसी पुरुषार्थ में रहा लेकिन वह एक ऊंट को बिठाता तो दूसरा खड़ा हो जाता। सुबह वह जब गुरु के पास गया तो गुरु ने पूछा क्या हुआ तो उसने कहा कि मैं एक को भी नहीं बिठा पाया।
तो गुरु ने समझाया कि जीवन भी ऐसा ही है एक तनाव आएगा वह सही होगा और दूसरा तनाव आ जाएगा। अवसाद का सबसे बड़ा कारण होता है पुरानी दुश्मनी, पुराने काम को पकड़ कर बैठना।
अवसाद एक ऐसा जहर है जो परिवार, मित्र, भगवान से भी संबंध को तोड़ देता है। टेंशन से कई कर्म का बंध होता है इसलिए वर्तमान में जीने का पुरुषार्थ रखना चाहिए और जिसे वर्तमान को छोड़ दिया उसका भविष्य और भूत, दोनों बिगड़ जाते हैं।













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