जीवन में साफगोई और स्वच्छता बडे़ मायने रखती है। स्वच्छता को ही जीवन में उतारने का भाव दर्शाता है दसलक्षण पर्व का चौथा दिन। यानी उत्तम शौच धर्म। जीवन में फैली मलिनता को दूर करना ही उत्तम शौच धर्म का पालन करना है। पढ़िए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर का विशेष आलेख…
जीवन में साफगोई और स्वच्छता बडे़ मायने रखती है। स्वच्छता को ही जीवन में उतारने का भाव दर्शाता है दसलक्षण पर्व का चौथा दिन। यानी उत्तम शौच धर्म। जीवन में फैली मलिनता को दूर करना ही उत्तम शौच धर्म का पालन करना है। ऐसी गंदगी जीवन में कदम दर कदम मिलती है। देखा जाए तो मलिनता को शरीर में प्रवेश करने का जरिया शरीर की कुछ घाणेंद्रियां ही हैं, मसलन आंख, नाक, कान, जिह्वा और चमड़ी। आंखों ने परिवार के किसी के पास कोई अच्छी देखी, वह हमारे काम की भी नहीं पर उसे लेने का इच्छा प्रकट हो जाती है, बस आंखों ने लोभ की गन्दगी अपने अन्दर जगह दे दी।
कानों ने सुना कि सोने का भाव कम हो गया है, तुरंत विचार आता है क्यों न सोना खरीद लें, जब भाव बढे़गा तब वापस बेच देंगे। बस इसी प्रकार से नाक, चमड़ी और जिह्वा भी जीवन में लालच लोभ की मलिनता से जीवन को भर देती है। इन सभी भावों को त्यागकर ही हम जीवन में खूबसूरती को पल्लवित कर सकते हैं।













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