यह नंद्यावर्त क्या है और क्या इसे थाली आदि में बना करके पूजा के समय बना सकते हैंं, इस शंका का समाधान करते हुए मुनि श्री सुधासागर महाराज ने कहा कि यह पूजा के समय थाली में नहीं बनाया जा सकता क्योंकि यह बहुत मांगलिक होता है, शुभ होता है। इसके ऊपर द्रव्य नहीं चढ़ाया जा सकता। वह पूजनीय है। जैसे हम भगवान के ऊपर जब भी चढ़ाते हैं, भगवान के लिए चढ़ाते हैं, भगवान ऊपर नहीं चढ़ाते हैं। इसी प्रकार नंद्यावर्त पूजनीय होता है। नंद्यावर्त के लिए द्रव्य चढ़ सकता है, नंद्यावर्त पर नहीं चढ़ सकता। जो थाली आपकी होती है, उसमें आप निर्वाण वाले द्रव्य चढ़ाते हैं, वह थाली पूजनीय है। पूज्य के लिए चढ़ाते हैं इसलिए थाली आदि में बनाना कोई बहुत शुभ या मांगलिक नहीं है। भेदन होता है दुर्लभ
नंद्यावर्त कैसे बनता है, इस प्रश्न के जवाब में मुनि श्री ने कहा कि नंद्यावर्त एक स्वस्तिक का ही दूसरा रूप है। स्वस्तिक में चारों भुजाएं एक तरफ मुड़ करके रुक जाती हैं और यह नंद्यावर्त अपने स्वस्तिक के आकार को ही इस ढंग से बनाता है जिस ढंग से संसार का सारा वायुमंडल चक्रव्यूह में जा करके उसके अंदर प्रवेश नहीं हो। इस ढंग से इसकी रचना होती है कि कहीं से भी कोई प्रवेश करना चाहे तो उसको प्रवेश का द्वार नहीं मिलता है। यानी कि वह अक्षर का ऐसा चक्रव्यूह है कि भेदन करना उसका बहुत दुर्लभ होता है। इसलिए उसकी आकृति हमारा सुरक्षा कवच होती है।
जब हम असुरक्षित हों नंद्यावर्त का ध्यान करें। जब हम चारों तरफ से परेशान हैं, जंगल में फंस गए हैं। शेर- चीते हैं डाकू आदि कोई भी आ सकता है। हमें भय लग रहा है तो उस समय नंद्यावर्त का ध्यान करके और नंद्यावर्त के ध्यान के साथ अपने आप मन को एकाग्र कर लें। सामने शेर भी आ गया हो तो वह रास्ता काट जाएगा। उसको दिखेगा ही नहीं कि मैं कहां से प्रवेश करूं तो कि हमने नंद्यावर्त का कवच बना लिया और नंद्यावर्त मैंने मस्तक पर धारण कर लिया, हृदय पर धारण कर लिया है तो नंद्यावर्त एक स्वस्तिक से भी भी एक विशेष रूप है। स्वस्तिक में तो हमारे लिए कई चार रास्ते दिखा देता है। नंद्यावर्त ऐसा घुमावदार बनता है कि उसके लिए इसकी आकृति वास्तु से बड़ी शुभ है। उसकी आकृति भी हमारे लिए रक्षा कवच का काम करती है, ऐसा बंधन है।













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