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धर्म प्रभावना रथ के दूसरा पड़ाव का 12वां दिन : जब अंदर के देव जागते हैं तो घर स्वर्ग बन जाता है – मुनि पूज्य सागर


अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के बारहवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 112 अर्घ्य चढ़ाए गए। इस अवसर पर मुनि श्री ने आज भगवान पार्श्वनाथ के निर्माण व मोक्ष कल्याण दिवस पर कहा कि हमें पारसनाथ भगवान के जीवन के अनुसार अपने जीवन में कषायों को कम करना व प्रेम, स्नेह का भाव, दूसरों के प्रति सकारात्मक का भाव रखना चाहिए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…


 इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के बारहवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 112 अर्घ्य चढ़ाए गए। सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक व शांति धारा का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक चंद्रसेन, शीला, जय, अलका होलकर, सारिका, आरुषि, द्विती गांधी परिवार को प्राप्त हुआ।

तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 44 काव्यों के साथ 2464 अर्घ्य समर्पित किए गए। आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरण व दीप प्रज्वलन का सौभाग्य, शास्त्र भेंट व अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य आज के पुर्ण्याजक चंद्रसेन- शीला होलकर, सारिका गांधी परिवार को प्राप्त हुआ।

श्री पार्श्वनाथ भगवान के निर्वाण और मोक्ष कल्याणक दिवस पर प्रथम लाडू चढ़ाने का सौभाग्य अजीत संदीप जैन, तिरुमला टाउनशिप, द्वितीय लाडू चढ़ाने का सौभाग्य प्रकाश चोडलिया परिवार को और तृतीय लाडू चढ़ाने का सौभाग्य डी.के. जैन रिटायर्ड डी.एस.पी. को प्राप्त हुआ। आज के इस पावन दिवस पर रिटायर्ड डी.एस.पी. डी.के. जैन ने मुनि श्री को कमंडल भेंट किया।

भगवान पारसनाथ के मार्ग पर चलें

इस अवसर पर मुनि श्री ने आज भगवान पार्श्वनाथ के निर्माण व मोक्ष कल्याण दिवस पर कहा कि हमें पारसनाथ भगवान के जीवन के अनुसार अपने जीवन में कषायों को कम करना व प्रेम, स्नेह का भाव, दूसरों के प्रति सकारात्मक का भाव रखना चाहिए।

आचार्य भगवंत कहते हैं कि पारसनाथ भगवान वह आत्मा है जिन्होंने एक या दो भव नहीं बल्कि अनेक भव कमठ के उपसर्गों को सहन किया। भगवान पारसनाथ को पूर्व भव में मरुदेव के नाम से जाना जाता है। मरुदेव के भाई का नाम ही कमठ था।

अपने भाई के द्वारा भी उपसर्ग को उन्होंने सहन किया और उन्होंने ऐसा सोचा कि मेरे अशुभ कर्म पाप नष्ट हो रहे हैं। ऐसे ही हमें भगवान पारसनाथ के आदर्श पर जीना चाहिए। अगर हमारे जीवन में दुख आते हैं तो ऐसा सोचना चाहिए कि एक पाप कर्म चला गया और जब सुख आते हैं तो पुण्य कर्म आ रहे हैं।

अगर सामने वाला क्रोध करता है और हम उसको जवाब दे देते हैं तो शत्रुता बढ़ती जाती है और अगर हम कुछ जवाब नहीं देते हैं तो एक दिन ऐसा जरूर आता है जब वह शत्रुता समाप्त हो जाती है। यदि 6 महीने से अधिक तक हमने कषाय को बांधकर रखा है तो वह मिथ्यादृष्टि होती है और वह तिर्यंच गति का बंध करवाती है।

उन्होंने यह भी कहा कि आज यह कैसा जमाना आ गया है कि जिसके साथ हम बचपन से उठते, बैठते, खाते हैं, एक ही मां बाप के बच्चे हैं फिर भी कषायों के कारण हम एक-दूसरे को देखना तक पसंद नहीं करते हैं। तो फिर हम कहां भगवान पारसनाथ के दया-करुणा के पथ पर चल पा रहे हैं।

अरे यह सोचो कि जो आज मेरे पास जो है, वह भी मेरा नहीं है, जो गया वह भी मेरा नहीं था, और जो आएगा वह भी मेरा नहीं है तो क्यों कमठ जैसे बन रहे हो। भगवान पारसनाथ के सिद्धांतों पर चलो। क्षमा आदि का भाव धारण करके पुण्य कमाओ और मन में यह अहंकार बनाकर मत बैठो कि मेरे बिना संसार नहीं चलेगा।

जब अंदर के देव जागते हैं तो घर स्वर्ग बन जाता है और जब राक्षस जागता है तो घर नर्क बन जाता है। अब आप निर्णय लो कि घर को स्वर्ग बनाना है कि नर्क बनाना है।

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