अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का सोमवार को श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, संविद नगर, कनाडिया रोड पर मंगल प्रवेश हुआ। मंदिर प्रांगण में महिलाओं ने कलश लेकर और समाज के श्रावकों ने मुनि श्री की अगवानी की। इसके बाद भगवान की शांति धारा की गई। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा है कि भगवान के प्रति श्रद्धा, आस्था रखकर पूजा करने पर ही पुण्य की प्राप्ति होती है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
पूजन करते समय द्रव्य के साथ भाव का होना अत्यंत आवश्यक
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का संविद नगर जैन मंदिर में मंगल प्रवेश
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज का सोमवार को श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, संविद नगर, कनाडिया रोड पर मंगल प्रवेश हुआ। मंदिर प्रांगण में महिलाओं ने कलश लेकर और समाज के श्रावकों ने मुनि श्री की अगवानी की। इसके बाद भगवान की शांति धारा की गई। इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री ने कहा है कि भगवान के प्रति श्रद्धा, आस्था रखकर पूजा करने पर ही पुण्य की प्राप्ति होती है। भगवान की पूजा कर रहे हैं, द्रव्य चढ़ा रहे हैं लेकिन भाव और मन नहीं हो तो पूजा आदि का फल नहीं मिलता। द्रव्य के साथ भाव का होना अत्यंत आवश्यक है। पूजा करते-करते मन सांसारिक कार्य में चला जाए तो वह पूजा सिद्धत्व का कारण नहीं हो सकती। भगवान के प्रति श्रद्धा और पुण्य अर्जन करने के लिए धन की आवश्यकता नहीं है। आप के पास धन नहीं है और धर्म करना चाहते हो तो मयूर पंख से भगवान की वेदी और भगवान की प्रतिमा का मार्जन कर लेना, वह भी द्रव्य पूजा के बराबर पुण्य देगी। पूजा आदि करते समय कषाय नहीं होना चाहिए बल्कि पूजा के बाद जीवन से कषाय निकल जानी चाहिए। एक सेठ ध्यान कर रहा था और उसे पानी की प्यास लगी तो मर कर मेंढक बना और एक मेंढक भगवान महावीर के दर्शन के लिए निकला और रास्ते में हाथी के पैर के नीचे दब कर मरा तो वह देव बना और वहां से आकर उसने महावीर भगवान के दर्शन किए। इसलिए भावों के साथ ही पूजन करना चहिए।
भेंट किया श्रीफल
कार्यक्रम में मुनि श्री को समाज अध्यक्ष एल.सी. जैन सा., सचिव महावीर जैन, मनोज छाबड़ा, पवन मोदी , महिला मंडल द्वारा और तिलक नगर समाज ने श्रीफल भेंट किया। मुनि श्री का पाद पक्षालन राजेश जैन (थाना संयोजक), संजय पापड़ीवाला, आनंद पहाड़िया, महावीर सेठ, सत्येंद्र जैन ने किया। शास्त्र भेंट कमलेशजी दिवाकर, राजमल मारू द्वारा किया गया। आभार महावीर जैन ने व्यक्त किया।













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