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प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाबचंद्र पुष्प जन्म शताब्दी समारोह शुरू : पुष्प जी की दिनचर्या अहिंसक जीवन शैली पर आधारित थी


 श्री दिगम्बर जैन पंचबालयति मंदिर इंदौर में प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाबचंद जी पुष्प जन्म शताब्दी समारोह एवं संस्कार सागर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित विद्वत् संगोष्ठी में आचार्य अभिनंदनसागर महाराज के प्रभावक शिष्य आचार्य उदारसागर जी महाराज एवं संघस्थ मुनि श्री उपशांतसागर महाराज, मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज, क्षुल्लक द्वय के मंगल सान्निध्य में देश के शीर्षस्थ विद्वानों ने अपने आलेख प्रस्तुत किये। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट….             


इंदौर। श्री दिगम्बर जैन पंचबालयति मंदिर इंदौर में प्रतिष्ठा पितामह पं. गुलाबचंद जी पुष्प जन्म शताब्दी समारोह एवं संस्कार सागर के रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित विद्वत् संगोष्ठी में आचार्य अभिनंदनसागर महाराज के प्रभावक शिष्य आचार्य उदारसागर जी महाराज एवं संघस्थ मुनि श्री उपशांतसागर महाराज, मुनिश्री पूज्यसागर जी महाराज, क्षुल्लक द्वय के मंगल सान्निध्य में देश के शीर्षस्थ विद्वानों ने अपने आलेख प्रस्तुत किये। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति राकेश कुमार जैन, अध्यक्ष डॉ. अनुपम जैन, इंदौर वरिष्ठ विद्वान ब्र. रतनलाल, डॉ. संगीता मेहता, पं. विनोद कुमार रजवांस, ब्र. जयकुमार निशांत, ब्र. अनिल भैया, ब्र. विजया दीदी, ब्र. रजनी दीदी, डॉ. मुकेश जैन ‘विमल’, पं. सुरेश मारौरा, पं. प्रवीण इंदौर, डॉ. सनतकुमार जैन, अतुल जैन ग्रीन पार्क दिल्ली, विनीता जैन के सान्निध्य में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चित्र का अनावरण, दीप प्रज्वलन, आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन ब्र. सुरेश मलैया, ब्र. जिनेश मलैया द्वारा सम्पन्न किये गये । पं. अनेकांत जैन बम्हौरी ने मंगलाचरण प्राकृत भाषा, संस्कृत भाषा एवं हिन्दी भाषा में किया। प्रथम वक्ता के रूप में ब्र. शशि दीदी ने पुष्प जी के संस्मरण में बताया कि पुष्प जी ने मुझे बचपन से ही वात्सल्य देते हुये अध्ययन कराया। मुझे बोलने के लिये प्रेरणा दी, , संस्कृत उच्चारण के साथ आवश्यक चर्या करने का निर्देशन किया। उन्होंने कहा कि पुष्प ने ककरवाहा जैसे अभावग्रस्त ग्राम में जन्म लेकर अपने पिता मन्नूलाल जैन से प्रारंभिक शिक्षा, मध्यमा शिक्षा एवं आयुर्वेदाचार्य का अध्ययन करते हुये स्वयं के पुरुषार्थ से प्रतिष्ठा के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित होने का गौरव प्राप्त किया। पं. डॉ. महेन्द्र ‘मनुज’ ने प्रतिष्ठा में यंत्र, मंत्र, तंत्र का विवेचन करते हुये बताया कि मंत्र साधना एवं यंत्र का प्रयोग किये बिना पाषाण से भगवान बनाने की प्रतिष्ठा विधि सम्पन्न नहीं हो सकती। आपने प्रतिष्ठाचार्यों के कर्त्तव्य को रेखांकित करते हुये बताया कि कुछ क्रियायें दिगम्बरत्व साधना के साथ ही सम्पन्न की जा सकती है, मात्र वस्त्र उतारकर नग्न होकर क्रिया करना उचित नहीं है।

आज कर रही हैं पालन

ब्र.कल्पना दीदी ने संस्मरण में बताया कि जब वह ग्यारवीं कक्षा में अध्ययनरत थीं तब पुष्प के पास चिकित्सा हेतु जाना पड़ा। पुष्प जी उस समय दैनिक पाठों का पारायण कर रहे थे। सभी प्रकार के स्रोतों का पाठ करने के पश्चात् आपने मुझे भी पाठ करने का निर्देशन दिया, जिसका मैं आज तक पालन कर रही हूं। कोई भी विद्वान चिकित्सक अध्यापक अपनी विद्या को सहज ही दूसरों को उपलब्ध नहीं कराता है। परंतु पुष्प जी ने प्रतिष्ठा पराग एवं प्रतिष्ठा पुष्प ग्रंथ के रूप में अपनी समस्त ज्ञानपूंजी सभी को समर्पित की।

उनके उपदेश उतारें जीवन में 

मुनि श्री उपशांत सागर महाराज जी ने अपने उपदेश में कहा कि पुष्प जी का व्यक्तित्व शब्दों में नहीं बांधा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व को सार्थक करने के लिये, उनके जैसे ही अपने जीवन में उतारने का पुरुषार्थ ही सच्ची श्रद्धांजलि है। आचार्य श्री उदारसागर महाराज ने पुष्प जी के व्यक्तित्व के बारे में बताते हुये कहा कि पुष्प जी की दिनचर्या अहिंसक जीवन शैली पर आधारित थी, उनकी प्रत्येक चर्या सावधानी पूर्वक संयम साधना के साथ सम्पन्न होती थी दैनिक चर्या के साथ भोजन, स्वाध्याय, अनुष्ठान, विधान, पंचकल्याणक सभी में उनका अनुशासन, शुद्धि, वात्सल्य, बहुमान परिलक्षित होता था। ब्र. अवस्था में मुझे भी उनके सान्निध्य में बहुत कुछ सीखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। जो आज मेरी श्रमण चर्या में सहयोगी हो रहा है। पुष्प जी चहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनके जीवन से शिक्षा लेकर हमें अपना जीवन संयममय बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिये। समारोह का संचालन करते हुये ब्र. निशांत भैया ने दोपहर कालीन एवं संध्या कालीन संगोष्ठी के सत्रों की जानकारी देते हुये सभी से उपस्थित होकर धर्म लाभ लेने का अनुरोध किया।

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