– श्री 1008 चंद्रप्रभु मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि 108 श्री अपूर्व सागर महाराज ने ये बताया कि मनुष्य भव पाने के लिए सुरपति भी तरसते हैं, क्योंकि देव पर्याय में रहकर रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कठोर तपस्या करके आत्मकल्याण नहीं कर सकते हैं। इसलिए देव भी मनुष्य पर्याय प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। लेकिन आज मनुष्य देव पर्याय प्राप्त करने को तरस रहे है।पढि़ए अशोक कुमार जेतावत की रिपोर्ट..
धरियावद। मनुष्य भव पाने के लिए सुरपति भी तरसते हैं, क्योंकि देव पर्याय में रहकर रत्नत्रय की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कठोर तपस्या करके आत्मकल्याण नहीं कर सकते हैं। इसलिए देव भी मनुष्य पर्याय प्राप्त करने के लिए तरसते हैं। लेकिन आज मनुष्य देव पर्याय प्राप्त करने को तरस रहे हैं। हमें तो भगवान बनने के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। हमें मनुष्य रूपी हीरा मिला है, इसके मूल्य को समझना चाहिए। श्री 1008 चंद्रप्रभु मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि 108 श्री अपूर्व सागर महाराज ने ये बताया। मुनिश्री ने कहा कि मनुष्यों को भगवान की रोजाना पूजा और आराधना करनी चाहिए। वर्तमान में देव, शास्त्र और गुरु ही पूजनीय हैं। अरिहंत-सिद्ध की पूजा करना, मां जिनवाणी का सही से रखरखाव करना और गुरुजनों को आहारदान देकर, वैयावृत्ति करके उनकी सेवा करना ही मनुष्य का धर्म है। इससे कषाय मंद होती है और मन पवित्र होता है।
अच्छे भावों से पुण्य बढ़ता है।
मुनिश्री ने कहा कि आज के समय में हर दिन बुरे विचारों से आत्मा अपवित्र हो रही है। आत्मा को पवित्र करने के लिए उसे मांजना पड़ता है। पूजा ही इसका सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। मन को शुद्ध रखना ही धर्म है। मुनिश्री ने पूजन करने के तीन फायदे बताए, वो हैं पूण्य एवं गुण में वृद्धि और ऋण से मुक्ति। अच्छे भावों से पुण्य बढ़ता है। सम्यग्दर्शन से गुणों में वृद्धि होती है। यह एक ऐसा मार्ग है जहां हम अपने आप से मुलाकात कर सकते हैं। आचार्य 108 श्री वर्धमान सागर महाराज के शिष्य मुनि अपूर्व सागर एवं मुनि अर्पित सागर धरियावद में विराजमान हैं। ब्रह्मचारी नमन भैया ने बताया कि चंद्रप्रभु मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि अर्पित सागर ने कर्म के बंधन से मुक्ति का मार्ग दिखलाया। मुनिश्री ने अपने प्रवचन में कहा कि शास्त्रों में चार गति बताई गई है, देवगति, मनुष्यगति, तिर्यंचगति और नरक गति। इनमें नरक गति सबसे दुखदायी होती है। इससे बचने के लिए हिंसात्मक कार्यों को नहीं करना चाहिए। सप्तव्यसन का सेवन नहीं करना चाहिए।













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