आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जब कोई किसी के उपकार को मानता है तो वो जीवन में बहुत ऊचाइयों को प्राप्त कर लेता है, चाहे वह गुरुओं का उपकार हो या माता पिता का। प्रेम और घृणा, उपकार और अपकार भी हमारे जीवन के अनिवार्य अंश हैं। जीवन में उपकार की प्रवृत्ति का अत्यंत महत्व है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि जब कोई किसी के उपकार को मानता है तो वो जीवन में बहुत ऊचाइयों को प्राप्त कर लेता है, चाहे वह गुरुओं का उपकार हो या माता पिता का। प्रेम और घृणा, उपकार और अपकार भी हमारे जीवन के अनिवार्य अंश हैं। जीवन में उपकार की प्रवृत्ति का अत्यंत महत्व है। दया, प्रेम, करुणा हमारी मूल प्रवृत्तियां हैं। इन्हीं से उपकार की भावना जागृत होती है।
उपकार करने से व्यक्ति श्रेष्ठ बनता है। किसी आपदा में पड़े व्यक्ति का आप उपकार करके देखें। उसका तो कल्याण होगा ही, किंतु इससे आपका मन प्रसन्नता से भर जाएगा। जिस शिष्य के अंदर अहंकार होता है, वह गुरु के उपकार को स्वीकार नहीं करेगा, वैसे ही माता – पिता का बच्चों पर बहुत बड़ा उपकार होता है। माता-पिता ने तुम्हें जन्म दिया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया, पढ़ा-लिखा कर बड़ा कर दिया लेकिन जो बच्चे अपने माता-पिता का उपकार मानते हैं, वे हमेशा अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञ रहते हैं।
उपकार का बदला पैसे से नहीं चुकाया जा सकता है लेकिन आजकल की संतानें तो माता-पिता का उपकार तक नहीं मानती हैं। वे कहते हैं कि मैंने योग्यता से पढ़ाई करके बड़ी-बड़ी उपाधियां प्राप्त की हैं। इसमें आपने क्या किया है और आपने जितने पैसे मेरी पढ़ाई में खर्च किये उतने आप मुझसे ले लो। अगर किसी ने कोई अपराध किया और वह उसे क्षमा कर दे यह बहुत कठिन है। अगर बहू सास को दस बातें सुना दे और बाद में क्षमा मांगने लगे तो क्षमा करना बहुत कठिन है। क्षमा मांगने से ज्यादा क्षमा करना कठिन है।
जिन्होंने भी क्षमा का सहारा लिया, वे महान बन गये। क्षमा का प्रकाश जिनके जीवन में आ जाता है, उनके जीवन में क्रोध का अन्धकार तिरोहित हो जाता है। क्रोध के परमाणु कड़वे होते हैं और क्षमा के परमाणु मीठे होते हैं ।













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