वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि गुरु की आराधना, संतों की संगति, जिनवाणी का श्रवण, हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों को ही बदल देती है। जैसे हमारे परिणामों में विशुद्धि बने वैसे वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। पढ़िए राकेश कासलीवाल की रिपोर्ट…
रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि एक बार लंकाधिपति रावण भगवान की भक्ति में लीन था। उसकी भक्ति को देखकर स्वर्ग के देव नागेन्द्र बहुत ही प्रसन्न हुए। नागेन्द्र रावण के पास आकर बोले- हे, रावण तुमने बहुत सुन्दर रोमांचक भजन गाया है, मैं तुम्हें कुछ भेंट स्वरूप देना चाहता हूं, बोलो तुम्हें क्या चाहिए। रावण नागेन्द्र से कहता है कि जिनेन्द्र भगवान की स्तुति से बढ़कर यदि कोई दूसरी वस्तु है तो वो मुझे प्रदान करें। नागेन्द्र कहते हैं कि इस संसार में भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई दूसरी कल्याणकारी वस्तु नहीं है।
भगवान की भक्ति से, आराधना से हमारे पूर्व जन्म के सम्पूर्ण पापकर्मों का बंध होता है, वे पाप कर्म क्षय को प्राप्त होते है और पुण्य कर्म का बंध होता है, विघ्न दूर होते हैं। विष निर्विष हो जाता है, भूत-प्रेत, पिशाच जो भी परेशान कर रहे हैं, वे सब भगवान की पूजा भक्ति से दूर हो जाते हैं।
हमेशा भगवान की भक्ति करें
पूज्य माता जी ने बताया कि गुरु की आराधना, संतों की संगति, जिनवाणी का श्रवण, हमारे जीवन की दशा और दिशा दोनों को ही बदल देती है। जैसे हमारे परिणामों में विशुद्धि बने वैसे वातावरण में रहने का प्रयास करना चाहिए। मंदिर का वातावरण, गुरुजनों की सभा का वातावरण कभी विषाक्त नहीं बनाना चाहिए, संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है जो भगवान की भक्ति से प्राप्त नहीं हो सकती। इसीलिए हमेशा भगवान की भक्ति करते रहना चाहिए l













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