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आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने धर्मसभा को किया संबोधित : वर्षा काल में, हम अत्यधिक सावधानी रखें ताकि हम हिंसा पाप से बच सकें


आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने धर्मसभा में श्रावकजन को संबोधित करते हुए कहा कि समरंभ, समारंभ, आरम्भ हिंसादि से युक्त कोई भी कार्य करने के लिए प्रयत्नशील होना, उसके लिए सामग्री जुटाना और कार्य करना यह क्रमशः समरंभ, समारंभ और आरंभ है। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…


इंदौर। आर्यिकारत्न विज्ञानमति माताजी ने धर्मसभा में श्रावकजन को संबोधित करते हुए कहा कि समरंभ, समारंभ, आरम्भ हिंसादि से युक्त कोई भी कार्य करने के लिए प्रयत्नशील होना, उसके लिए सामग्री जुटाना और कार्य करना यह क्रमशः समरंभ, समारंभ और आरंभ है। स्थावर जीव जिन्हे एक इंद्रिय जीव कहते है की विरादना हम बिना विचारे करते रहते है। इस संसार में सबसे अधिक वनस्पति कायिक जीव हैं। प्रतिदिन ना जाने गाड़ियों के नीचे छत में जहां काई होती है अगर उसकी सुई की नोक के बराबर मात्रा में अनंत निगोदिया (सूक्ष्म) जीव होते हैं अतः हमें ध्यान रखना चाहिए की वर्षा काल में, हम अत्यधिक सावधानी रखें ताकि हम हिंसा पाप से बच सकें।

श्रावक की अनुपस्थिति में साधु की चर्या

जिन स्थानों में श्रावक नहीं है वहां पर साधु शौच हेतु अपने कमंडल में “शुद्ध जल झरने का जल” लेकर इस क्रिया को पूर्ण करते हैं क्योंकि झरने से आने वाला जल, एक अंतरमुहूर्त के लिए अमल एवम प्रासुक होता है। साधु कभी भी जल के लिए श्रावक से याचना नहीं करता। जिन स्थानों पर जिन धर्म अनुयायी कम है, उन स्थानों में पूर्व में साधु अपने कमंडल के मुख को खोलकर चलते थे। ताकि अगर कोई जिन धर्म अनुयाई श्रावक उस खुले हुए कमंडल को देखें तो वह समझ जाता था, कि यह कमंडल खाली है, इसमें जल भरना है। और फिर श्रावक उसमें प्रासुक जल भर देते थे। साधु अपने किसी भी कार्यों के लिए याचना नहीं करते किंतु हर परिस्थितियों में अपने अहिंसा महाव्रत का पूर्ण पालन करते हैं।

पल प्रतिपल प्रायश्चित करें
जब हम कृषि कार्य करते हैं, तो उसमें एक इंद्री, दो इंद्री, तीन इंद्रिय जीवो की असंकल्पित हिंसा होती रहती है। कृषक को ध्यान रखना चाहिए कि वह हर कृषि कार्य करने पर प्रायश्चित करें। अगर हम भवन निर्माण कर रहे हैं, मंदिर का निर्माण कर रहे हैं अथवा अपना स्वयं का गृह का निर्माण कर रहे हैं। तो हमें प्रायश्चित करना चाहिए क्योंकि यहां पर भी अनंत जीवो की हमारी वजह से घात होता है। डायमंड की खानों में हीरा निकालते समय किए जाने वाले ब्लास्ट से हमारे, वैभव के लिए हमारे रत्न आभूषण के लिए पंचेेंद्रीय तक के जीवो का घात होता है। हम कभी पत्थर उठाते हैं, कार्टून उठाते हैं वहां पर समूर्छन जीव (वे जीव जिनकी उत्पत्ति बिना माता-पिता के होती है) तो नीचे लाखों कुंथु जीव होते हैं उनका घात होता है। मंदिर के भीतर पांडुक शिला जो कृत्रिम रूप से हमने निर्मित की है उसकी चार पायों में संधियों के नीचे भी जीव हो सकते हैं हमें सावधानी रखना चाहिए। पूजा की चौकी के नीचे भी जीव हो सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि हम 5 पूजा करें, हम एक ही पूजा करें किंतु सावधानी पूर्वक अगर हम जीवो की रक्षा कर सकेंगे तो इससे अच्छा पुण्य बंध और कोई नहीं होगा।

मारीच के जीव से महावीर और सिद्ध शिला की यात्रा

आयु कर्म पूर्ण होने पर आत्मा शरीर को छोड़ती है। किंतु कथनचित द्रव्य और पर्याय सर्वथा भिन्न नहीं होते हैं और कथन चित द्रव्य पर्याय सर्वथा एक भी नहीं होते हैं। उदाहरणार्थ मारीच रूपी व्यक्ति महावीर नहीं बना। मारीच का जीव आयु कर्म पूर्ण होने पर भिन्न भिन्न पर्ययों में जन्म लेता गया और सिंह की पर्याय में सम्यक दर्शन भी प्राप्त किया, देव बना बाद में माता त्रिशला की गर्भ में आकर वह महावीर बना। पर्याय की अपेक्षा से मारीच की पर्याय से महावीर का जीव भगवान महावीर बना और भगवान महावीर से जीव मुक्त होकर सिद्ध बना।

बाधक नही साधक बनें
यह देखा गया है कि कुछ लोग अनावश्यक रूप से भी जगह-जगह पर अपमानित होते रहते हैं। यह दरअसल में इसलिए होता है क्योंकि उन्होंने पूर्व भावों में लोगों का तिरस्कार किया होगा,मुनि की निंदा की होगी,लोगों को रोका टोका होगा उनके अच्छे कार्यों को करने में बाधक बने होंगे तो उन्हें इस जन्म में व्यर्थ ही लोगों के रोष का सामना करना पड़ता है। तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। और बुराइयों का सामना करना पड़ता है। अतः ध्यान रखिए सावधानी रखिए कि आप निरंतर लोगों का सम्मान करें। शब्दों से हम सम्मान तो कर ही सकते हैं। मंदिर में अगर कोई आता है उसे व्यर्थ परेशान ना करें उसे बैठने के लिए स्थान दें उसकी पूजा उसके अभिषेक इत्यादि में सहायक बने। ऐसा करके आप वर्तमान भाव में लोगों को दिए हुए मान और बहूमान से अपने आने वाले भावों के लिए तिरस्कार अपमान और उपेक्षा से बच जाएंगे और आपका सम्मान होगा।

नियम की रक्षा कैसे करें

अगर हमें तकलीफ है, तो हमें अकेले में जाकर रो लेना चाहिए। फूट-फूटकर रो लेना चाहिए, किंतु अगर कोई आ जाए तो उसके सामने मुस्कुरा कर उससे मिलना चाहिए। क्योंकि अगर हम उसके सामने रोएंगे अपनी तकलीफ को बताएंगे तो सहानुभूति बस वह आपकी तकलीफ दूर करने के लिए आपके नियम को तुड़वा देगा। उदाहरण के लिए, अगर आपका सर दुख रहा है। इतना भीषण सर दर्द है कि वह सहन नहीं हो रहा है और इस सरदर्द को आप अपने किसी इष्ट के सामने बताते हैं। तो वह आपकी तकलीफ को दूर करने के लिए रात्रि में भी आपको औषधि देगा । किंतु आपका रात्रि में औषधि लेने का त्याग है क्या आप इससे अपने नियम की रक्षा कर पाएंगे?

परिवेदन करने से असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है

किसी को निरंतर अपनी समस्या बताते रहने से, अपने दुखों को बताते रहने से, मन की व्यथाओं को बहुत ज्यादा बताने से, हमेशा ही वेदना-वेदना गाते रहने से, परिवेदन से असाता वेदनीय कर्म का बंध होता है। हमें मन के अंदर प्रसन्नता रखना चाहिए। कोई व्यक्ति अगर हमारे पास में आता है तो अपनी वेदना को बार-बार उसे नहीं बताना चाहिए। प्रसन्नता रखने से दुख तकलीफ में कम हो जाती हैं किंतु दुख को निरंतर लोगों के सामने रखने से वह बढ़ता है। अपने स्वभाव में परिवर्तन लाइए ताकि लोग आपसे मिलना जुलना पसंद करें क्योंकि ऐसे व्यक्ति जो दुखों में भी प्रसन्न रहते हैं। वे सभी के प्रिय होते हैं।

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