शुद्ध मन पापों से रहित होता है। व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लिए चोरी करता है, दूसरों के धन को हड़पता है । आप विचार कीजिए कि व्यक्ति के धन को आपने हड़पा है या जिस व्यक्ति के यहां आपने चोरी की है वह कितना दुखी हुए होगा। जब वह दुखी है तो आप सुखी कैसे रह सकते हो। आप किसी न किसी अपराध में यहां कैद हैं । आपको अपने किये अपराध का प्रायश्चित करना चाहिए। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…
मुरैना। मन को शांत रखना बहुत बड़ी साधना है। इच्छाएं मन को अशांत करती हैं। आज भौतिकवादी युग में अशांति का एक कारण मोबाइल भी है। मोबाइल का जितना ज्यादा दुरुपयोग करोगे, मन उतना ही ज्यादा अशांत रहेगा। व्यक्ति मोबाइल में जिस तरह के चित्र देखता है, फिर उसे पाने की लालसा उसके मन में जाग्रत होती है। उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह गलत काम करने लगता है। इसे ही पाप कहा जाता है । जब गलत देखोगे तो मन में गंदगी एकत्रित होगी। जब गलत नहीं देखोगे तो मन शुद्ध रहेगा । शुद्ध मन पापों से रहित होता है।
व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लिए चोरी करता है, दूसरों के धन को हड़पता है । आप विचार कीजिए कि व्यक्ति के धन को आपने हड़पा है या जिस व्यक्ति के यहां आपने चोरी की है वह कितना दुखी हुए होगा। जब वह दुखी है तो आप सुखी कैसे रह सकते हो। आप किसी न किसी अपराध में यहां कैद हैं । आपको अपने किये अपराध का प्रायश्चित करना चाहिए । बन्दीगृह में बंद रहते हुए भी प्रभु भक्ति करते हुए, मन की शुद्धि करते हुए नेक इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए । जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने मुरैना जेल में कैदियों को संबोधित करते हुए यह विचार व्यक्त किए।

मन को रखें साफ
पूज्य गुरुमां ने कैदियों से कहा कि मन वचन काय से अपराध और पाप होते हैं। पाप की मुख्य जड़ मन है। जिस प्रकार घर की सफाई हम प्रतिदिन करते हैं, उसी प्रकार हमें प्रतिदिन मन की सफाई भी करना चाहिए। कहा गया है कि गन्दे घर में लक्ष्मी का वास नहीं होता, उसी प्रकार गन्दे मन में ईश्वर का वास नहीं होता। मन को साफ रखने के लिए ईर्ष्या, राग, द्वेष से दूर रहकर अपने इष्ट की आराधना करना चाहिए । मन को साफ रखने के लिए प्रयास और मेहनत की आवश्यकता होती है। बाहर का कचरा तो सबको दिखता है, किंतु मन का कचरा तो हमें स्वयं देखना होगा। क्रोध, मान, माया, लोभ, हिंसा, चोरी, कुशल और परिग्रह के कारण ही मन अशांत रहता है। हम अपने मन में वैर, राग, द्वेष रूपी कचरे को इकट्ठा किए रहते हैं। यही पाप का मूल कारण हैं। जब व्यक्ति को क्रोध आता है तो वह स्वयं तो जलता ही है, दूसरों को भी जलाता है । अधिकांशतः अपराध क्रोध में ही होते हैं। आपको किसी ने बुलाया नहीं, आपको किसी ने पूछा नही, आपकी बात किसी ने मानी नहीं, बस आपको बुरा लग गया और क्रोध आ गया। क्रोध आने का मुख्य कारण आपका अहंकार है। व्यक्ति अपने अहंकार और अपनी नाक ऊची रखने के लिए क्रोध करता है और क्रोध के वशीभूत होकर वह अपराध करता है । क्रोध में हम यह भी नहीं देखते की सामने कौन हैं । हम अपराध और पाप कर बैठते हैं। क्रोध शांत होने पर हमें अपने किये पर पछतावा भी होता है।
करें प्रायश्चित
जैन साध्वी श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने कैदियों को समझाते हुए कहा कि आप सभी किसी न किसी अपराध में यहां सजा काट रहे हैं। आपने जाने-अनजाने में जो भी पाप किये हैं, यहां बन्दीगृह में रहते हुए आप सभी उनका प्रायश्चित करें । अपने इष्ट की आराधना करते हुए नेक इंसान बनने की कोशिश करें और भविष्य में कभी भी अपराध न करने की शपथ लें।













Add Comment