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ज्ञान की बता,आपके साथ: भगवान आदिनाथ का परिचय

gyaan kee bata,aapake saath: bhagavaan aadinaath ka parichay

जैन धर्म इस काल के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ हुए है । इन्हें आदिब्रह्मा,ऋषभदेव नाम से भी जाना जाता है । जन्म अयोध्या में पिता का नाम नाभिराय और माता मरूदेवी था के यहां हुआ था । भगवान आदिनानाथ का जन्म इक्ष्वाकु वंशकुल में हुआ था । उनके शरीर का वर्ण स्वर्ण के समान था ।

भगवान ऋषभदेव की दो पत्नियाँ थी सुनन्दा और नन्दा। इनके सौ पुत्र और दो पुत्रियाँ थी, जिनमें सुनंदा से भरत और ब्राह्मी तथा नंदा से बाहुबली और सुंदरी प्रमुख हैं। इन्होंने अपनी ब्राह्मी और सुंदरी नामक दोनों पुत्रियों को क्रमश: अक्षर और अंक विद्या सिखाकर समस्त कलाओं में निष्णात किया।

बाह्मी लिपि का प्रचलन तभी से हुआ। आज की नागरी लिपि को विद्वान उस ही का विकसित रूप मानते हैं। भगवान का गर्भ कल्याणक: आषाढ़ कृष्ण 2 ,जन्म कल्याणक: चैत्र कृष्ण 9 ,दीक्षा कल्याणक :चैत्र कृष्ण 9 ,केवलाज्ञान कल्याणक : फा . कृष्ण 11,मोक्ष कल्याणक माघ कृष्ण 14 है ।

शरीर की ऊंचाई 500 धनुष प्रमाण थी । वैराग्य नीलांजना की मृत्यु देखकर कर हुआ था । वैराग्य के बाद उन्हें सुदर्शन नाम की पालकी में देवता,मनुष्य बैठाकर सिद्धार्थ वन में ले गए थे जहां उन्होंने दीक्षा धारण कर ली थी । दीक्षा वटवृक्ष के नीचे ली थी उसकी ऊंचाई 6000 धनुष की थी ।

उनके साथ 4000 राजा ने भी दीक्षा ली थी । छह माह तक उपवास का नियम लिया था और छह महीने तक उन्हें आहार की विधि नही मिली उसके बाद आहार की विधि हस्तिनापुर में राजा श्रेयांस के यहां पर मिली और उन्हें प्रथम तीर्थंकर को प्रथम आहर देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ।

सर्व प्रथम गन्ने के रस का आहार लिया था । तपस्या का काल एक लाख पूर्व था । समवसरण 12 योजन योजन का था । गणधरों की संख्या 84 थी । मुख्य गणधर वृषभ सेन ,मुख्य आर्यिका ब्राह्मी, मुख्य श्रोता भरत चक्रवती थे । यक्ष गोमुख और यक्षिणी चक्रेश्वरी देवी है । मोक्ष कैलास पर्वत से प्राप्त किया था ।

मोक्ष पद्मासन से गए और इनके साथ 10000 मुनि के साथ मोक्ष गए ।

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