दिल्ली. समीर जैन। श्री शान्तिनाथ दिगम्बर जैन मन्दिर, रानी बाग, दिल्ली में परम पूज्य आचार्य श्री विराग सागर जी महाराज के परम शिष्य क्षुल्लक श्री विदेह सागर जी महाराज के मंगल आगमन पर समस्त समाज द्वारा भावभीना स्वागत किया गया। धर्मसभा को संबोधित करते हुए क्षुल्लक श्री ने कहा कि मन और इन्द्रियों को संयमित करने वाले ही मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। यह मन बहुत चंचल है, पलभर में कहीं से कहीं पहुंच जाता है।
उन्होंने कहा कि मन को नियंत्रित करने वाला ही वास्तव में बलवान होता है परंतु मन को कभी भी मारा या दबाया नहीं जा सकता। जल और मन दोनों ही नीचे की ओर बहते हैं। जिस प्रकार जल को ऊपर ले जाने के लिए यंत्र की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मन को ऊपर ले जाने के लिए मंत्र की आवश्यकता होती है। मन ही मनुष्य के जीवन में बंधन और मुक्ति का कारण बनता है।
क्षुल्लक श्री ने आगे कहा कि मन कोई शत्रु नहीं है जो उसे जीता जाए, अपितु मन के साथ तो जीया जाता है। मन हमेशा निषेध की ओर आकर्षित होता है, हमेशा विपरीत दिशा में भागता है। जब हमारा उपयोग संसार से सन्यास की ओर बढ़ जाए, विकार से विराग की ओर चला जाए, वासना से साधना की ओर गतिमान हो जाए तथा भोगों से निकलकर योग में रम जाए, उसी दिन हमारा यह जीवन सार्थकता को प्राप्त करता हुआ प्रतीत होने लगने लगेगा।
उन्होने कहा कि मन एक रोग है और इस रोग की मात्र एक दवा है, समाधि मन को ध्यान से, अध्यात्म से अथवा एकाग्रता से समाधि की ओर अग्रसर किया जा सकता है। जहां आधि, व्याधि व उपाधि की समाप्ति होती है, वहीं पर समाधि की साधना हो पाती है। जीवन में सफलता के लिए मन को मत मारो अपितु मन की वासना को मारो, मन के संसार को मारो तथा मन में व्याप्त कषायों को मारो।












