समोसरण मंदिर, कंचन बाग में तप की महिमा बताई मुनि जी ने
न्यूज सौजन्य- राजेश दद्दू
इंदौर। जब सोना तपता है तभी चमकता है। इसी प्रकार तप के प्रभाव से आत्मा भी चमकती है। जो तपस्वी, साधु तप में लीन होते हैं वही सिद्धालय पहुंच पाते हैं। जितने भी जीव आज तक मुक्ति को प्राप्त हुए हैं, वे सब तप से ही हुए हैं। तपस्वी बनना चाहते हो तप करो या फिर तपस्वियों की विनय और उनके तप की अनुमोदना करो।
यह उद्गार मुनि श्री अप्रमित सागर जी महाराज ने शनिवार को समोसरण मंदिर, कंचन बाग में तप की महिमा बताते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जो जीव तपस्वियों की निंदा और अवहेलना करते हैं, उसके दुष्परिणाम जीव को भुगतना ही पड़ते हैं और उनका मरण भी मांगलिक नहीं होता, लेकिन जो तपस्वियों की सेवा, प्रशंसा और उनके तप की अनुमोदना करते हैं उनके जीवन में चमत्कारिक परिणाम होते हैं। मीडिया प्रभारी राजेश जैन ने बताया कि मुनिश्री आदित्य सागरजी महाराज ने भी धर्मसभा में उद्गार व्यक्त करते हुए मनुष्य, नरक, त्रियंच और देव गति के दुखों का वर्णन किया और कहा कि राग- द्वेष, संसार भ्रमण एवं गति व कर्म बंध का कारण हैं। अतः राग- द्वेष का अंधेरा मिटाना है तो अंतरंग में ज्ञान का विवेक का दीपक जलाओ एवं माध्यस्थ भाव से जीना प्रारंभ करो।












