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व्रतों का पालन करने वाले स्वाध्याय अवश्य करेंः मुनि श्री आदित्य सागर

न्यूज सौजनु- राजेश जैन दद्दू

इंदौर। `हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों से विरक्त होना व्रत है और इनसे निशल्य होकर जो रहता है वह व्रती है। व्रत की प्राप्ति होना सामान्य विषय नहीं है। व्रत की प्राप्ति स्वाध्याय का फल है। व्रत का पालन करने वाले व्रती को स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए। स्वाध्याय आपकी आंतरिक शक्ति को प्रकट करने का साधन है।’
उक्त उद्गार मुनि श्री आदित्य सागर जी महाराज ने समोसरण मंदिर मैं मंगलवार को चातुर्मासिक प्रवचन माला में व्यक्त किए। स्वाध्याय का महत्व और एक बेतरतीब संज्ञा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आप लोग गुलाब जामुन खाते भी हैं और बनाते भी हैं लेकिन उसमें न तो गुलाब की महक होती है और ना ही जामुन का स्वाद। लेकिन फिर भी नाम गुलाब जामुन है। यह बेतरतीब संज्ञा है। लेकिन जब आप स्वाध्याय करेंगे तो सत्य संज्ञा और सत्य संज्ञान के ज्ञान की प्राप्ति होगी आपने श्रोताओं के समझाया कि देखा देखी व्रतों का पालन नहीं करना चाहिए। व्रत का पालन करने और व्रती बनने से मैं देव बनूंगा, लोग मेरी अष्टद्रव्य से पूजा करेंगे। इस भाव से भी व्रती नहीं बनना चाहिए। शक्ति ना हो तो अणुव्रती बनकर रहना चाहिए। जैनागम में सिद्ध बनने के बहुत साधन हैं। अगर उपवास की शक्ति नहीं है तो स्वाध्याय करें, स्वाध्याय की नहीं है तो साधु संतों की वैयावृत्ति करें। जैसी आपकी रुचि होगी, वैसा ही आपको आगम के अनुरूप सिद्धत्व की प्राप्ति होगी लेकिन श्रेष्ठता तो महाव्रती बनने में ही है।
इस अवसर पर मुनि श्री सहजसागर जी ने भी प्रवचन में भावों और वाणी का संबंध बताते हुए कहा कि भावों की पहचान भाषा से होती है। हमारी वाणी एवं भावों में विनम्रता होनी चाहिए। विनय मोक्ष का द्वार है। जो झुकता है वही श्रेष्ठ है। अतः नम्र बनें और वाणी को वीणा बनाएं, वाण नहीं। धर्मसभा में पंडित रतनलालजी शास्त्री, कैलाश वेद, डॉक्टर जैनेंद्र जैन आजाद जैन आदि समाज श्रेष्ठी उपस्थित थे। धर्म सभा का संचालन अजीत जैन ने किया।

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