इंदौर सहित देशभर में जैन समाज के लिए 18 जून का दिन बेहद पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होने वाला है, क्योंकि इस दिन जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर, शांति और अहिंसा के प्रतिमूर्ति भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का मोक्षकल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन बड़ी श्रद्धा और भक्ति वात्सल्य के साथ मनाया जाता है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल का यह संकलित और संपादित आलेख…
इंदौर। इंदौर सहित देशभर में जैन समाज के लिए 18 जून का दिन बेहद पावन और आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होने वाला है, क्योंकि इस दिन जैन धर्म के 15वें तीर्थंकर, शांति और अहिंसा के प्रतिमूर्ति भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और हर्षाेल्लास के साथ मनाया जाएगा। तिथि के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का मोक्षकल्याणक ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्थी के दिन बड़ी श्रद्धा और भक्ति वात्सल्य के साथ मनाया जाता है। अहिल्या नगरी इंदौर, जो अपनी अनूठी जैन संस्कृति, भव्य कांच मंदिर और चैत्यालयों के लिए प्रसिद्ध है, उसके सहित संपूर्ण भारतवर्ष के दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन भक्ति का अनूठा सैलाब उमड़ेगा। जैन पुराणों के अनुसार भगवान धर्मनाथ जी का जन्म इक्शवाकु वंश के राजा भानु और माता सुव्रता के यहां रत्नपुरी में माघ शुक्ल त्रयोदशी को हुआ था, जिनका वर्ण कंचन के समान दैदीप्यमान था और जिनका चिह्न ‘वज्रदंड’ है।
मोक्ष का अर्थ आत्मा का समस्त कर्मों के बंधन से पूर्णतः मुक्त होना है
गर्भकाल से ही लोक में धार्मिक प्रवृत्तियों और दया भाव में अभूतपूर्व वृद्धि करने वाले भगवान धर्मनाथ जी ने संसार के भोगों को नश्वर मानकर दिगंबर दीक्षा धारण की थी और घोर तपस्या के पश्चात केवलज्ञान प्राप्त कर समवशरण के माध्यम से भव्य जीवों को मोक्ष मार्ग का उपदेश दिया था। जैन दर्शन में मोक्ष का अर्थ आत्मा का समस्त कर्मों के बंधन से पूर्णतः मुक्त हो जाना है और भगवान धर्मनाथ जी ने अपनी आयु के अंत में सम्मेद शिखरजी के पावन पर्वत से मौन ध्यान धारण कर आत्मिक विशुद्धि प्राप्त करते हुए सिद्धपद प्राप्त किया था। जो हर श्रावक को यह याद दिलाता है कि मानव जीवन का परम लक्ष्य सांसारिक वैभव नहीं बल्कि अपनी आत्मा को शुद्ध बनाना है।
समृद्धि की कामना के साथ महाशांतिधारा होगी
इस पावन अवसर पर 18 जून को अल सुबह से ही जैन मंदिरों में पूरा वातावरण धर्ममय हो उठेगा। मंदिरों में वेदी पर विराजमान भगवान धर्मनाथ जी की प्रतिमा का जल से भव्य अभिषेक किया जाएगा तथा विश्व शांति, प्राणिमात्र के कल्याण और राष्ट्र की समृद्धि की कामना के साथ महाशांतिधारा होगी। इस दिन सामूहिक रूप से भगवान धर्मनाथ मोक्ष कल्याणक विधानश् का आयोजन होगा, जिसमें श्रावक सुरम्य भजनों और ढोल-मंजीरों की थाप पर नृत्य करते हुए अर्घ्य समर्पित करेंगे और भगवान धर्मनाथ के ‘चालीसा’ व ‘निर्वाण कांड’ का पाठ करेंगे।
आत्मा भी सिद्धत्व की मिठास को प्राप्त करे
इस पूरे उत्सव का सबसे मुख्य और अनूठा आकर्षण ‘निर्वाण लाडू’ चढ़ाना होता है, जिसमें शुद्ध घी, सूखे मेवों और बूंदी से निर्मित बड़े आकार के मोदक को केसर से रंजित कर, अर्घावली पढ़ते हुए भगवान के चरणों में इस भावना के साथ समर्पित किया जाता है कि जैसे बूंदी के कण मिलकर मीठा मोदक बनते हैं, वैसे ही हमारी आत्मा भी सिद्धत्व की मिठास को प्राप्त करे।
मंदिरों में तैयारियों का दौर
मालवा का ‘जैन गढ़’ कहे जाने वाले इंदौर शहर के रेसकोर्स रोड, क्लॉथ मार्केट, कनाड़िया, विजय नगर और प्रसिद्ध कांच मंदिर सहित सैकड़ों दिगंबर जैन मंदिरों में समाज के युवा संगठन और महिला मंडल रंगोली सजाने, महाआरती का प्रबंधन करने और लाडू वितरण की तैयारियों में जुटे हैं। कई स्थानों पर रात्रि में भक्ति संध्या और भगवान धर्मनाथ के जीवन पर आधारित नाटिकाओं का मंचन भी होगा। चारों ओर धार्मिक उल्लास का माहौल दिखाई दे रहा है।
संयम के मार्ग को अपने जीवन में उतारने का महापर्व
वास्तव में भगवान धर्मनाथ जी का मोक्ष कल्याणक केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति नहीं है, बल्कि आज के अशांत और भागदौड़ भरे युग में उनके द्वारा बताए गए अहिंसा, सत्य, दया और संयम के मार्ग को अपने जीवन में उतारने का महापर्व है।













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