आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज का सोमवार प्रातः कमला नगर से मंगल विहार उपरांत छीपीटोला में ससंघ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। सात साधुओं के संघ के साथ हुए इस मंगल प्रवेश में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और जयघोषों के साथ आचार्यश्री का स्वागत किया। आगरा से पढ़िए, शुभम जैन की रिपोर्ट…
आगरा। आचार्यश्री निर्भयसागर जी महाराज का सोमवार प्रातः कमला नगर से मंगल विहार उपरांत छीपीटोला में ससंघ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। सात साधुओं के संघ के साथ हुए इस मंगल प्रवेश में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए और जयघोषों के साथ आचार्यश्री का स्वागत किया। छीपीटोला पहुंचने पर आचार्यश्री ने सर्वप्रथम जिनालय में भगवान के दर्शन कर विधिपूर्वक वंदना की। धर्मसभा में उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति और आत्मकल्याण का संदेश दिया। अपने मंगल प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि वर्तमान समय कलयुग का दौर है, जिसमें धर्म का वास्तविक स्वरूप धीरे-धीरे परिवर्तित होता दिखाई दे रहा है। आज आत्मदर्शन की अपेक्षा प्रदर्शन को अधिक महत्व दिया जा रहा है। धर्म के स्थान पर धंधे, पुण्य के स्थान पर पैसे तथा परमार्थ के स्थान पर अर्थ को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि धर्म के क्षेत्र में भी बाहरी आडंबर मंत्र-तंत्र, टोना- टोटका और ढोंग को बढ़ावा मिलने से धर्म की गरिमा प्रभावित हो रही है। ऐसे ढोंगी व्यक्तियों के कारण लोगों में धर्म के प्रति अनास्था का भाव उत्पन्न हो रहा है जबकि, सच्चा धर्म आत्मशुद्धि, संयम और सदाचार का मार्ग दिखाता है।आचार्यश्री ने कहा कि साधु समाज लेने के लिए नहीं, बल्कि देने के लिए आता है। गुरु के सान्निध्य का वास्तविक लाभ वही प्राप्त कर सकता है जो अपने जीवन का कुछ समय निकालकर गुरु के निकट रहकर उनके उपदेशों को आत्मसात करता है।
उन्होंने भक्ति की महत्ता बताते हुए कहा कि भक्ति एक ऐसा सेतु है जो भक्त और भगवान के बीच संबंध स्थापित कर जीवन की मंजिल तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करती है। अपने उद्बोधन के अंत में आचार्य श्री ने कहा कि वर्तमान समय में भक्ति का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। सच्ची श्रद्धा, समर्पण और आस्था के स्थान पर दिखावे की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसलिए आवश्यक है कि व्यक्ति बाहरी प्रदर्शन से दूर रहकर आत्मकल्याण और सच्चे धर्म की ओर अग्रसर हो। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर आचार्यश्री के मंगल प्रवचनों का श्रवण किया तथा धर्मलाभ प्राप्त किया।













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