शीला फलक पर कुछ लिखावट थी जिसे काफ़ी श्रम के साथ पढ़ा गया तब आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए जिससे ज्ञात हुआ की यह तीर्थंकर भगवान की माताओं को समर्पित है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि पूरे चौबीस तीर्थंकर बालक अपनी माताओं की गोद में बैठ हुए हैं। इंदौर से पढ़िए, मातृ दिवस पर यह विशेष आलेख…
इंदौर। मालवांचल की ऐतिहासिक नगरी वर्द्धमानपुर बदनावर, जो कि इंदौर के निकट स्थित होकर धार जिले का तहसील मुख्यालय है, यूं तो यह नगर कई मामलों में अपनी छाप छोड़ता है। उसी तारतम्य में देखें तो यहां से प्राप्त हजार वर्ष प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमाएं जो अपने कला सौंदर्य और सौम्य वीतरागी छवि की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इन्हीं प्रतिमाओं के साथ पुरातत्व में रूचि रखने वाले समाज जनों को एक शीला फलक दो तीन टुकड़ों में प्राप्त हुआ था। उन्होंने उसे भी इन प्रतिमाओं के साथ संग्रहित कर लिया था। यह था तीर्थंकरों की माताओं का अद्भुत शीला फलक। निर्ग्रन्थ सेंटर आफ आर्कियोलॉजी इंदौर के पुरातत्व संयोजक एवं वर्द्धमानपुर शोध संस्थान के ओम पाटोदी ने बताया कि इस शीला फलक पर कुछ लिखावट थी जिसे काफ़ी श्रम के साथ पढ़ा गया तब आश्चर्यजनक तथ्य सामने आए जिससे ज्ञात हुआ की यह तीर्थंकर भगवान की माताओं को समर्पित है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि पूरे चौबीस तीर्थंकर बालक अपनी माताओं की गोद में बैठ हुए हैं। ऐसा संयुक्त शिल्पांकन अब तक ओर कहीं देखने में नहीं आया अतः मातृत्व प्रेम को प्रदर्शित करता यह एक अद्वितीय शिल्पांकन है जिसने वर्द्धमानपुर बदनावर नगर का गौरव बढ़ाया है।
चार माताएं ललितासन में शिल्पांकित
पाटोदी ने बताया कि वर्तमान में ये शीला फलक का एक हिस्सा जो जयसिंहपुरा उज्जैन के जैन संग्रहालय में सरल क्रमांक 75 पर प्रदर्शित है। यह प्रस्तर खंड 36x43x20 से.मी. बेसाल्ट पत्थर, 12-13वीं शती का होकर यह वास्तुखण्ड अपने दुर्लभ विषय के कारण संग्रहालय की अत्यंत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। एक शिल्पखंड में चार लघु में बाल लिए हुए चार माताएं ललितासन में शिल्पांकित हैं। प्रत्येक माता के नीचे क्रमशः तीर्थकरों की माताओं सिरिदेवी, वीरमाणी, उमादेवी, त्रिशला देवी नामों का उल्लेख है। इनमें त्रिशला देवी भगवान महावीर की माता का नाम है। जैन कला में तीर्थंकरों की माताओं का बालकों के साथ अंकन, यह दुर्लभ शिल्पांकनों में से एक है। तीन हिस्से जो अलग रखें हुए हैं इन सभी को मिलकर यह चौबीस तीर्थंकर बालक प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें तीर्थंकर भगवान श्री महावीर स्वामी को बाल अवस्था में अपनी माताओं के साथ बैठा हुआ पूर्णता को प्राप्त होता है। विश्व मातृ दिवस पर मातृत्व प्रेम को प्रदर्शित करता ये प्रस्तर खंड देश की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक उपलब्धि है जिसके प्राप्त होने का गौरव मालवांचल के प्राचीन वर्द्धमानपुर (वर्तमान बदनावर) को जाता है।













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