जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला के तहत आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। जैन धर्म के 11वें तीर्थंकर भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पावन दिन 8 मई को आ रहा है। यह हमें याद दिलाता है कि एक महान आत्मा का आगमन केवल एक भौतिक घटना नहीं, बल्कि संपूर्ण जगत के कल्याण (श्रेय) का सूचक है। इंदौर सहित देश भर के दिगंबर जैन मंदिरों में इस अवसर पर भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और विशेष पूजन जैसे अनुष्ठान श्रद्धापूर्वक किए जाते हैं।
गर्भ कल्याणक की कथा
जैन ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रेयांसनाथ का जीव अपने पूर्व जन्म में पुष्करवर द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में राजा नलिनगुल्म था। वहां कठिन तपस्या और आत्म-साधना के माध्यम से उन्होंने ‘तीर्थंकर नाम कर्म’ का संचय किया। इसके पश्चात वे अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी के दिन उस महान आत्मा ने वाराणसी के निकट सिंहपुरी नगरी (वर्तमान सारनाथ) के राजा विष्णुराज और रानी सुनंदा (विष्णुदेवी) के घर गर्भ में प्रवेश किया। उनके गर्भ में आने से 6 माह पूर्व से ही देवराज इंद्र की आज्ञा से कुबेर ने सिंहपुरी में रत्नों की वर्षा शुरू कर दी थी। रानी ने गर्भ धारण करते समय 16 शुभ स्वप्न देखे जो एक तीर्थंकर के अवतरण का संकेत थे।
नामकरण और ‘श्रेय’ का संदेश
भगवान के जन्म के बाद राजा विष्णु का राज्य और प्रजा अत्यंत समृद्ध और सुखी हो गई। चारों ओर ‘श्रेय’ (कल्याण) का वातावरण निर्मित होने के कारण इंद्र ने उनका नाम ‘श्रेयांसनाथ’ रखा। उनका प्रतीक चिह्न ‘गैंडा’ है, जो शक्ति और अडिगता का परिचायक है।
भगवान श्रेयांसनाथ के मुख्य संदेश और उपदेश
भगवान श्रेयांसनाथ का संपूर्ण जीवन और उनकी दिव्य देशना हमें आत्म-उत्थान के कई सूत्र देती है।
-कल्याण का मार्ग: भगवान का नाम ही ‘श्रेय’ (कल्याण) से जुड़ा है। उन्होंने सिखाया कि वास्तविक कल्याण बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के शुद्धिकरण में है।
-अहिंसा और करुणा: उन्होंने समस्त जीवमात्र के प्रति दया भाव रखने और मन-वचन-काय से किसी को कष्ट न पहुंचाने का उपदेश दिया।
-सांसारिक क्षणभंगुरता: राजसी सुखों के बीच रहने के बावजूद उन्होंने ऋतु परिवर्तन को देखकर वैराग्य धारण किया। यह संदेश देता है कि संसार के सभी भोग अनित्य हैं और केवल धर्म ही शाश्वत साथी है।
-इंद्रिय संयम और अपरिग्रह: उन्होंने अनावश्यक संग्रह (अपरिग्रह) को छोड़ने और अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने पर बल दिया।
वर्तमान प्रासंगिकता
भगवान श्रेयांसनाथ का गर्भ कल्याणक हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में ‘श्रेय’ (जो हितकारी हो) को चुनें, न कि केवल ‘प्रेय’ (जो केवल देखने में प्रिय हो) को। आज के भौतिकवादी युग में उनकी शिक्षाएं हमें आंतरिक शांति और संतोष का मार्ग दिखाती हैं। श्रद्धालुओं द्वारा किया जाने वाला पाठ और विधान केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके गुणों को अपने भीतर उतारने का संकल्प है।













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