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आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 10 वर्षों के बाद भव्य मंगल प्रवेश : श्री दिगंबर चंद्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ठिकरिया गांव में हुुई भव्य अगवानी 


प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 मई को 6.5 किमी विहार कर श्री दिगंबर चन्द्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ग्राम ठिकरिया में हाथी धोड़े, सैकड़ों ध्वज पताका भक्ति नृत्य के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। जयपुर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


जयपुर। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण पट्ट परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का 5 मई को 6.5 किमी विहार कर श्री दिगंबर चन्द्रप्रभ मंदिर चंद्रपुरी बड़ के बालाजी ग्राम ठिकरिया में हाथी धोड़े, सैकड़ों ध्वज पताका भक्ति नृत्य के साथ भव्य मंगल प्रवेश हुआ। भागचंद सुनीता चुड़ीवाल परिवार ने आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर मंगल आरती की। आचार्य श्री के साथ 10 मुनिराज, 20 आर्यिका, 1 ऐलक, 4 क्षुल्लक और 1 क्षुल्लिका सहित 37 पिच्छी का प्रवेश हुआ। सुनीता भागचंद चुड़ीवाल अनुसार इसके पूर्व 28 फरवरी 2016 को आचार्य श्री संघ का जयपुर महानगर के बड़ के बालाजी में प्रवेश हुआ था। आचार्य संघ श्री जी के दर्शन, पंचामृत अभिषेक के बाद मंचासीन हुए। श्री चंद्रप्रभ भगवान के चित्र अनावरण कर दीप प्रज्वलन ब्रह्मचारी गज्जू भैय्या एवं अतिथियों सुनीता, भागचंद चूड़ीवाल परिवार ने किया। नृत्य मंगलाचरण के बाद मुनि श्री हितेंद्रसागर जी के प्रवचन हुए। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने समाधिस्थ आर्यिका श्री सुपार्श्व मतिजी के जन्म स्थली सनावद में वर्ष 1964 चातुर्मास का उल्लेख कर यादें साझा की।

आत्मा को कोई नहीं देखता 

आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि देव शास्त्र और गुरु परम आराध्य हैं। इनकी भक्ति से कर्म नष्ट प्रक्षालन होता हैं। देव ,शास्त्र ,गुरु जैनधर्म के प्राण हैं और उनका जीवन, संसार के प्राणी के लिए मार्गदर्शक होता है। चाहे देव हो, चाहे शास्त्र हो या गुरु हो। उनके द्वारा प्राप्त मार्गदर्शन जो होता है। उस मार्गदर्शन से संसार का प्राणी अपने जीवन को संवारता है। जब आप घर से निकलते हैं तो दर्पण आपके सामने होता है। दर्पण के सामने आप खड़े होते हैं और उस दर्पण में अपने शरीर कमी को देखकर ठीक करते हो। आत्मा को कोई नहीं देखता कि आत्मा कर्मों से मलीन है। शरीर को देखते हैं कि अब हम घर से बाहर जा रहे हैं हमारा शरीर ठीक है या नहीं है।

जब पाप कर्मों का उदय आता है, जब जीवन में बाधा कष्ट आते हैं

आचार्य श्री ने आगे बताया कि ममता कहंे या मोह कहें। इस मोह से ऊपर उठने के लिए भगवान जी के चरणों में जाया जाता है। अभिषेक पूजन भक्ति की जाती है। धार्मिक कार्यों से आत्मा पुण्य कमाती अर्जित करती है। उस पुण्य के फल से श्रेष्ठ मानव कुल प्राप्त होता है। श्रेष्ठ कुल में मार्गदर्शक गुरुजन जो है, वो मार्ग जैसा बताते हैं। वैसे कर्म करने से पाप कर्म पुण्यकर्म किए जाते हैं। जब पाप कर्मों का उदय आता है, जब जीवन में बाधा कष्ट आते हैं। आचार्य श्री ने कहा कि हमें याद आती गणिनी आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी, उन्होंने दीक्षा का संकल्प लिया था उसे पूरा किया।

आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी को याद कर आचार्यों का भी किया स्मरण

आचार्यश्री वर्धमानसागर जी ने कहा कि वचन का पालन करना साधु का परम कर्तव्य होता है। जिनके जीवन में धर्म का आलंबन होता है, वे ठीक-ठीक प्रकार से विचार कर दृढ़ संकल्प को पूर्ण करते हैं। अपनी गृहस्थ अवस्था और आर्यिका श्री सुपार्श्व मति जी के चातुर्मास का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हम बहुत छोटे थे, उस वर्षायोग में माताजी के पास बैठकर के अध्ययन करने का एक अवसर मिला था। माताजी ने हमें सन 1965 में देखा था लेकिन, उनके मन में एक भाव था, क्या देखा था? क्या उनका ज्योतिष ज्ञान था? कुछ पता नहीं लेकिन, उन्होंने कहा कि इस व्यक्ति में कुछ दम योग्यता गुण तो है। चतुर्थ पट्टाधीश श्री अजित सागर जी महाराज ने आचार्य पद का निर्णय किया। उस निर्णय को मुहर लगाने का काम माताजी ने किया था। माताजी ने यही कहा था कि मैंने 1965 में उनको उनके घर में देखा था। मेरा ज्ञान कहता है कि यह आचार्य जरूर बनेंगे। आचार्य श्री धर्म सागर जी महाराज, आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज का मस्तक पर हाथ रखा हुआ आशीर्वाद साथ रहा। आचार्य श्री अजीत सागर जी महाराज भी अस्वस्थ थे और अस्वस्थता के कारण उन्होंने 4 लाइन का श्लोक लिखकर भेजा। आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज की समाधि के बाद हम सब लोग अजमेर में थे। 4 लाइन का 1 श्लोक लिखा हुआ, जिस की अंतिम पंक्ति थी। मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं पर मिलाने वाला दुर्लभ है। संघ में साधुओं ने निर्णय लिया आज ही चलेंगे देखें दुर्लभता क्या करती है और उसी समय संघ ने विहार कर दिया और जाकर मिल गए।

भक्ति में वो शक्ति है और शक्ति प्राप्त होती है

आचार्यश्री ने कहा कि हमें अवसर मिला आचार्य श्री की सेवा करने का। बंधुओं देव शास्त्र, गुरु की, भक्ति करें, पूजन करें, आराधना करें, इससे पुण्य अर्जन करें। ये 3 द्रव्य तो ऐसे हैं कि जिनकी भक्ति कभी खाली नहीं जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि वैसे हमारा मन बने यदि देव शास्त्र, गुरु की भक्ति करते हैं। सुनिश्चित बात है कि उसका फल अवश्य प्राप्त होता है क्योंकि, उनकी भक्ति में वो शक्ति है और शक्ति प्राप्त होती है। भक्ति करने वाले को वह अपने जीवन में सुकार्य शुभ कार्य करता है, पुण्य अर्जन करता है और पुण्य अर्जन करने के बाद उसे उसका प्रतिफल पूरे रूप में मिलता है। पीले पीले वस्त्र ड्रेस कोड हो गया। पुरुषों ने 1 ड्रेस कोड बना लिया। पीला कुर्ता और सफेद पाजामा। ड्रेस कोड का बड़ा महत्व होता है। भगवान का अभिषेक करने के लिए भी सुनिश्चित ड्रेस धोती दुपट्टा है। देव गुरु हमारे परम आराध्य है। सारे कर्मों का प्रक्षालन भी देव शास्त्र गुरु की परम भक्ति करके ही कर सकते हैं।

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