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आचार्य धर्म सागर जी महाराज के 39वें अंतर्विलय वर्ष पर विनयांजलि: संयम, तप और त्याग की अनुपम मिसाल को जैन समाज ने किया नमन 

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झालरापाटन/इंदौर। तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी महाराज के 39वें अंतर्विलय वर्ष पर जैन समाज ने भावभीनी विनयांजलि अर्पित की। उनके त्याग, तप और संयमपूर्ण जीवन को याद कर श्रद्धालुओं ने कोटिशः नमोस्तु किया। पढ़िए राजेश पंचोलिया की यह रिपोर्ट

महान संत को विनम्र श्रद्धांजलि

जैन समाज ने चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री 108 शांतिसागर जी महाराज की अक्षुण्ण परंपरा के तृतीय पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 धर्म सागर जी महाराज के 39वें अंतर्विलय वर्ष पर भावभीनी विनयांजलि अर्पित की। श्रद्धालुओं ने उनके चरणों में कोटिशः नमोस्तु अर्पित करते हुए उनके आदर्शों को स्मरण किया।

जीवन परिचय—संस्कारों की धरती से उदय

आचार्य श्री का जन्म 12 जनवरी 1914 को राजस्थान के गंभीरा में हुआ। बचपन से ही धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत रहे और जीवन को धर्ममय बनाने का संकल्प लिया।

दीक्षा और तप का पथ

उन्होंने क्षुल्लक, ऐलक और मुनि दीक्षा प्राप्त कर संयम मार्ग को अपनाया। कठोर तप, त्याग और साधना के बल पर वे धर्म सागर जी महाराज के रूप में विख्यात हुए।

आचार्य पद की गौरव यात्रा

24 फरवरी 1969 को श्री महावीरजी, राजस्थान में उन्हें तृतीय पट्टाचार्य पद पर आसीन किया गया। उनके सानिध्य में 76 दीक्षाएं हुईं, जिनमें अनेक संतों ने संयम मार्ग अपनाया।

 

समाज को दी अमूल्य दिशा

आचार्य श्री ने अपने जीवन में 43 चातुर्मास कर समाज में धर्म, अहिंसा और संयम का संदेश फैलाया। उनके प्रमुख शिष्यों में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज का नाम प्रमुख है।

समाधि—अद्भुत संयोग

उनकी अंतर्विलय समाधि 1987 में सीकर, राजस्थान में हुई। विशेष बात यह रही कि उनका जन्म और समाधि दोनों ही तीर्थंकर भगवान के कल्याणक दिवस पर हुए—जो एक अद्भुत संयोग माना जाता है।

श्रद्धा और प्रेरणा का संगम

इस अवसर पर आर्यिका श्री महायश मती एवं संघस्थ आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के सानिध्य में श्रद्धालुओं ने उनके जीवन से प्रेरणा लेने का संकल्प लिया।

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