किसी भी वर्ष का फल नव संवत्सर के दशाधिकारियों की स्थिति, वर्ष के चार स्तंभ, वर्ष लग्न प्रवेश आदि के आधार पर जाना जा सकता है। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस वर्ष विक्रम संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है। रौद्र संवत्सर में अनेक देशों के प्रमुखों के बीच आपसी क्लेश, क्षोभ एवं समस्त प्राणियों में आपसी तनाव बना रहता है। पढ़िए मनोज जैन नायक की रिपोर्ट…
मुरैना (मनोज जैन नायक)। किसी भी वर्ष का फल नव संवत्सर के दशाधिकारियों की स्थिति, वर्ष के चार स्तंभ, वर्ष लग्न प्रवेश आदि के आधार पर जाना जा सकता है।
वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने बताया कि इस वर्ष विक्रम संवत्सर का नाम ‘रौद्र’ है। रौद्र संवत्सर में अनेक देशों के प्रमुखों के बीच आपसी क्लेश, क्षोभ एवं समस्त प्राणियों में आपसी तनाव बना रहता है। वर्षा मध्यम होती है। रौद्र वर्ष के स्वामी चंद्र हैं, जिससे बीमारियाँ अधिक होती हैं और अधिकारी वर्ग भी परेशान रहता है। आषाढ़ एवं श्रावण मास में अल्प वर्षा, भाद्र मास में अधिक वर्षा तथा बाढ़ से जन-धन की हानि होने की संभावना रहती है।
दशाधिकारियों के फल
वर्ष का राजा गुरु होने से समाज में लोग धर्म कार्यों में संलग्न रहेंगे, महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा तथा ब्राह्मण वर्ग यज्ञादि धार्मिक कार्यों में सक्रिय रहेगा। विश्व शांति की दिशा में सार्थक प्रयास होंगे।
मंत्री मंगल का फल—शासक एवं उच्च अधिकारी वर्ग की हठधर्मिता के कारण प्रजा में अशांति, धरना-प्रदर्शन, अग्निकांड एवं हिंसा की घटनाएँ बढ़ेंगी।
सस्येश गुरु का फल—सस्येश गुरु होने से अन्न, रस, दूध आदि की प्रचुरता रहेगी।
धान्येश बुध का फल—सिंध एवं पंजाब को छोड़कर वर्षा अच्छी होगी, जिससे कृषि उत्पादन बेहतर रहेगा। गेहूं, जौ, चना, सरसों, राई, अरहर आदि का उत्पादन अधिक होगा।
मेघेश चंद्रमा का फल—वर्षा अच्छी होने से तालाब, बांध आदि जलमग्न रहेंगे। अनाज, फल-फूल का उत्पादन अच्छा होगा तथा उद्योग-धंधों का विकास होगा।
रसेश शनि का फल—रसेश शनि होने से रस पदार्थों की कमी रहेगी। संसद के वर्षाकालीन सत्र में नेतागण आरोप-प्रत्यारोप में उलझे रहेंगे।
नीरसेश गुरु का फल—नीरसेश गुरु होने से हल्दी, चना, हरी सब्जियाँ, हरी-पीली दालें तथा पीले रंग की धातुओं एवं वस्तुओं में मंदी रहेगी।
फलेश चंद्र का फल—वृक्षों में फल-फूल की अच्छी उत्पत्ति होगी।
धनेश गुरु का फल—प्रजा को धन लाभ होगा तथा व्यापारी वर्ग अच्छा मुनाफा कमाएगा।
दुर्गेश चंद्र का फल—यात्री यात्रा के दौरान स्वयं को असुरक्षित महसूस करेंगे। गुंडों एवं चोरों के उपद्रव से जनता में असुरक्षा की भावना रहेगी।
गुड़, शक्कर, दूध, घी आदि के व्यापार से अच्छा लाभ होगा।
वर्ष के चार स्तंभ से फल
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को रेवती नक्षत्र का योग 4 प्रतिशत है, अतः वर्षा कम और अनियमित होगी। समयानुकूल वर्षा नहीं होने से भूजल स्तर गिरेगा और कृषि उपज को नुकसान होगा।
वैशाख शुक्ल प्रतिपदा को भरणी नक्षत्र का योग 22 प्रतिशत है, अतः घास कम उत्पन्न होगी, जिससे पशुपालकों को कष्ट होगा। ज्येष्ठ शुक्ल प्रतिपदा को मृगशिरा नक्षत्र का योग 53 प्रतिशत होने से वायु स्तंभ सामान्य रहेगा, किंतु आंधी-तूफान से जन-धन की हानि हो सकती है।
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा को पुनर्वसु नक्षत्र का योग 43 प्रतिशत है, अतः अन्न स्तंभ मध्यम रहेगा और खाद्य पदार्थों के मूल्य बढ़ सकते हैं।
जैन ने कहा कि आर्षमान पर विचार के अनुसार अक्षय तृतीया को रोहिणी नक्षत्र का योग 14 प्रतिशत है, पौष अमावस्या को मूल नक्षत्र का योग 26 प्रतिशत है। श्रावण पूर्णिमा को श्रवण नक्षत्र का अभाव है तथा कार्तिक पूर्णिमा को कृतिका नक्षत्र 81 प्रतिशत है। कुल मिलाकर देश की आंतरिक सुरक्षा के प्रति सतर्कता आवश्यक है।
ज्योतिषाचार्य डॉ. हुकुमचंद जैन ने अपनी ज्योतिषीय ग्रह गणना करते हुए भविष्यवाणी में कहा कि देश की आंतरिक सुरक्षा इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि 19 मार्च को नव विक्रम संवत् 2083 का आरंभ प्रातः 06:53 बजे चंद्रमान से हुआ। उस समय मीन लग्न उदित था और लग्न में सूर्य, चंद्र, शुक्र, शनि स्थित थे, जिनकी मंगल एवं राहु की अशुभ युति से द्वादश भाव में अशुभ योग बना हुआ है।
यह योग पश्चिमी देशों में हिंसा, अशांति, युद्ध तथा जन-धन की हानि का कारण बन सकता है। किसी देश में सत्ता परिवर्तन की भी संभावना है। भारत में भी हिंसा, उपद्रव एवं धार्मिक कट्टरता के कारण वर्ग संघर्ष बढ़ सकता है। विश्व स्तर पर कुछ अप्रत्याशित एवं विनाशकारी घटनाओं से अशांति और युद्ध के बादल मंडराते रहेंगे।
इन सबके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रभाव बढ़ेगा। सत्तारूढ़ पार्टी के विरुद्ध विपक्ष आक्रामक बना रहेगा, फिर भी सत्तादल देश की अर्थव्यवस्था और विकास दर बढ़ाने में सफल रहेगा।













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