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मुनि श्री निष्पक्ष सागरजी महाराज के हुए केशलोच : पंचम युग में ऐसी साधना सहज नहीं है


आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर जी महाराज ने सोमवार प्रातः बेला में अपने केशो का लोचन किया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज एवं आचार्य श्री समयसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री निष्पक्ष सागर जी महाराज ने सोमवार प्रातः बेला में अपने केशो का लोचन किया। केशलोच एक साधना तपस्या है जो केवल दिगंबर संत ही कर सकता है। पंचम युग में ऐसी साधना सहज नहीं है। बिना किसी उपकरण के अपने हाथों से केश का उखाड़ना केवल बानी एवं राख का उपयोग करते हुए। मुनिश्री निष्पक्ष सागर महाराज साधना तपस्या के सतत प्रहरी हैं।

केशलोच प्रक्रिया: जैन साधु उस्तरा या मशीन का उपयोग नहीं करते। वे अपने बाल स्वयं हाथों से उखाड़ते हैं (केशलोच), जो शरीर के प्रति मोह और वेदना पर विजय का प्रतीक है।

चारित्रिक शुद्धि: केशलोच की प्रक्रिया मुनियों के वैराग्य, संयम और शारीरिक पीड़ा सहन करने की क्षमता का प्रतीक मानी जाती है।

  साधुओं के 28 मूलगुणों में कैशलोच होता है 

‘इक बार दिन में ले आहार खड़े अलप निज ध्यान में

कच लाँच करत न डरत परिषह सो लगे निज ध्यान में’

केशलोच के विषय में बता दे कि दिगंबर संत स्वावलंबी होते है, वे किसी को भी कष्ट न देते हुए स्वयं की साधना करते हैं। चाहे कैसा भी कष्ट क्यों न हो, वे समभाव मेंउसे सहन करते हुए मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होते है। साधना साधना के रास्ते कामना के वास्ते चल दे राही चल जैन संत अहिंसा व्रत के पालन के साथ ही शरीर से राग भाव को भी हटाते हैं। जब जैन संत स्वयं के हाथों केशलोच करते है तो उनके चेहरे पर मुस्कुराहट देखने को मिलती है। जो अपने आप में पंचम युग में एक उत्कृष्ट साधना है।

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