आचार्यश्री वर्धमानसागर जी का 36वां आचार्य पदारोहण 27 जून को आ रहा है। इस अवसर पर जहां सकल जैन समाज आचार्यश्री के स्वरूप का स्मरण कर रहे हैं। वहीं आर्यिका महायशमति जी ने उनके विराट स्वरूप को शब्दों में अभिव्यक्त किया है। इंदौर से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
इंदौर। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की मूल परंपरा के पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी हैं। आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के रोपित चरित्र रूपी पौधे की वृद्धि एवं रक्षा आचार्य श्री वीर सागर जी, आचार्य श्री शिव सागर जी, आचार्य श्री धर्म सागर जी, आचार्य श्री अजित सागर जी ने की है। आचार्यश्री वर्धमान सागर जी को आचार्य पद 24 जून 1990 आषाढ़ सुदी दूज को आचार्य श्री अजित सागर जी के लिखित आदेश अनुसार दिया गया। पूर्वाचार्याें द्वारा अभि सिंचित उस चारित्र वृक्ष ने वर्तमान में विशाल रूप धारण किया है। उसका संरक्षण, सिंचन एवं संवर्धन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी बहुत ही कुशलता से कर रहे हैं। यह बात संघस्थ शिष्या आर्यिका श्री महायशमती माताजी ने कही। उन्होंने कहा कि आपकी शासन पद्धति अपने आप में बहुत ही महान है। आप के शासन में इस निकृष्ट काल लिखकर तत्काल में भी पूर्वाचार्याें के समान विशाल संघ एक सूत्र में अनुबद्ध है। आपके हृदय में स्थित मृदुता की प्रतीक सरल स्पष्ट एवं मृदु वाणी हास्य युक्त प्रसन्न मुख मुद्रा से प्रभावित होकर अनेक भव्य आत्मा अपने पापों का पक्षालन करते हुए जीवन सफल एवं धन्य मानते हैं।
आपका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं को दिया हुआ है। आपकी निर्भय एवं निरीह वर्ति समन्वित सम दृष्टि इस आशय का द्योतक है कि निर्धन और श्रीमंत आदि सभी के प्रति आपका समान व्यवहार है। इस प्रकार आपके ज्योतिर्मय जीवन की जगमगाती ज्योति से आज कितने ही प्राणी अपने आत्म ज्योति का अन्वेषण कर रहे हैं और करते रहेंगे। माताजी ने कहा कि आपकी अथाह महिमा को प्रदर्शित करना अव्यक्त है।
मधुर वाणी सौम्य छवि ने वात्सल्यता से स्थान बनाया
मैं छोटी सी शिष्या आचार्य श्री के चरणों में त्रिकाल नमोस्तु करती हूं तथा कुछ मन के भावों के श्रद्धा सुमन को अर्पित करती हुई भावना करती हूं कि गुरुदेव शतायु होकर हमें मार्गदर्शन देते रहें। आपके द्वारा प्रदत आर्यिका व्रत आपकी पुनीत छत्र छाया में निर्दाेष पलता रहे। आप के संपर्क में जो व्यक्ति एक बार आ गया। वह आपकी सौम्य प्रशांत मूर्ति को विस्मृत नही कर सकता है। उन्होंने कहा कि आपका व्यवहार पक्ष जितना सुंदर और सबल है। उतना ही आध्यात्मिक पक्ष प्रबल है। समता आपके व्यवहार में सह चरणी के रूप में रहती है। सच तो यह है कि आप की मधुर वाणी सौम्य छवि ने वात्सल्यता के कारण जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना लिया। आपके निर्मल मन की आभा ने लोगों की अपनी ओर खींच लिया है और आपकी सरलता और भद्रता ने देश व समाज पर मानो जादू कर दिया है। आपके जीवन का प्रत्येक क्षण उच्च साधना का परिचय देता है क्यांेकि, मिथ्यान्धकार से ग्रसित जीवों को आप अपने आलोक से प्रकाश प्रदान करने में सूर्यवृत सिद्ध हुए हैं। आर्यिका श्री महायशमती ने कहा कि गुरुदेव लोकानुरंजन से दूर रहते हैं। रत्नत्रय की निधि में आप सदा आलोकित रहते हैं। आप की आगम निष्ठा एवम तपश्चरण अग्नि सराहनीय है। तभी तो आज दिगंबर साधु समुदाय में आपका जीवन अत्यंत गौरवपूर्ण श्रद्धा के आधार का केंद्र बना हुआ है। वर्तमान की भौतिकता के युग में भी आप चतुर्थ काल के जैसी चर्या या यूं कहें कि चारित्र चक्रवर्ती प्रथम आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज की बनाई हुई आगम परंपरा के अनुसार चर्या का पालन कर रहे हैं और संघ के साधुआंे से करवा रहे हैं। आप इस युग के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। जिसकी दिव्य दृष्टि सदा सदैव बनी रहेगी।
आचार्यश्री की विशेषताएं
वीतराग वाणी को जीवन में आकार रूप देने वाले आर्त और रौद्र ध्यान से दूर रहने वाले स्व पर कल्याण में दत्त चित पत्ती की तरह रहने वाले साधना में सर्वाेच्च स्थान रखने वाले प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के धनी दिव्य ज्योति करुणा के सागर प्रवचन पटू शांत स्वभावी भद्र परिणामी ज्ञान ध्यान तप में सदा निरत निस्पर्ह सहिष्णुता की साकार मूर्ति अद्वितीय संत बस यही है आपका जीवन परिचय।
निर्ग्रन्थ चर्या में वैसे तो प्रत्येक युग मंे कठिन चर्या रही है
आर्यिका महायशमति जी ने कहा कि जो स्वयं मोह को छोड़कर कुल पर्वतों के समान पृथ्वी का उद्धार करने वाले हैं। जो समुद्र के समान स्वयं धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं तथा जो आकाश के समान व्यापक होने से किसी के द्वारा स्पष्ट ना होकर विश्व की विश्रांति के कारण है ऐसे अपूर्व गुणों को धारक पुरातन पूर्वाचार्यांे के समान उनके गुणों का अनुकरण करने वाले महान आचार्य परमेष्ठी हैं। निर्ग्रन्थ चर्या में वैसे तो प्रत्येक युग मंे कठिन चर्या रही है किंतु इस कलियुग में तो ओर भी कठिन हो गई है क्योंकि, इस भौतिक युग मे लोगो की भोग लिप्सा प्राणियों में आत्म रुचि तथा संसार से विरक्त नहीं होने देती है। आचार्य श्री सोमदेव ने कहा भी है कि इस इस कलिकाल में मनुष्यों की चित्त चंचल हो गए। धर्म में उपयोग स्थिर नहीं रहता तथा शरीर अन्न का कीड़ा बन गया है तथापि आज भी बड़ा आश्चर्य है कि जिनेद्र रूप के धारक निर्ग्रन्थ साधु पाए जाते हैं। यह सब प्रताप आचार्य शांतिसागर महाराज का है साधूना दर्शनम पुण्यम तीर्थ भूता ही साधक कालेन फलति तीर्थ सद्य साधो समागमसाधु के दर्शन कर पुण्य तो होता है क्योंकि, साधु तीर्थ स्वरूप है।
साधु दर्शन से तत्काल ही फल मिलता है
तीर्थ दर्शन तो कालांतर में फलदाई होता है किंतु साधु दर्शन से तत्काल ही फल मिलता है। इसी उक्ति के अनुसार मेरे मन में साधु समागम की उत्कृष्ट भावना घर कर गई और परम शांत वात्सल्य मूर्ति ऋषिराज का दर्शन ही निर्मल दृष्टि का कारण बना। उसी समय जीवन में रत्नत्रय को धारण करके जिनके जैसा बनना है। दृढ़ संकल्प लिया प्रताप गुरु भक्ति के सब मुक्ति प्राप्त होती है तो क्या उसे सूची पदार्थों की प्राप्ति नहीं हो सकती। गुरु भक्ति सती मुक्तये शूद्रा कि वा ना साध यति त्रैलोक्य मूल्यरत्नेन दुर्लभा किम प्रयोजनम अर्थात गुरुभक्ति से जब मुक्ति प्राप्त होती है तो क्या क्षुद्र पदार्थाें की प्राप्ति नही हो सकती जैसा अमूल्य रत्न से तीनों लोक की संपत्ति प्राप्त होती है तो उससे धान्य का छिलका प्राप्त नहीं हो सकता है। इन्ही विचारांे ने मन को प्रेरित किया कि अनादि काल से संसार के दुःखों से संतृप्त मुझ को इन गुरुदेव की भक्ति और इनके चरण सानिध्य में ही संसार समुद्र से पार होने का उपाय प्राप्त हो सकता है। अतः मैने निर्णय लिया कि अब इन परम गंभीर एवं शांत गुरुवर की सन्निधि में ही अपना जीवन व्यतीत करना है।
श्री शांति सिंधु सी निर्भयता
हो वीर सिंधु सी निर्मलता
शिव सागर सा अनुशासन हो
हो धर्म सिंधु सी निस्पर्हता
संयत वाणी चिंतन शक्ति हो। अजित सुरिवर सी दृढ़ता इन सर्व गुणों का संचय हो। वृद्धि गत हो मन की मृदुता हो। मार्ग आपका निष्कंटक यशवती बने यह परंपरा।













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