अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज और क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज के सानिध्य में नेमिनगर जैन कॉलोनी में नौ दिवसीय सिद्धचक्र मंडल विधान के पांचवे दिन सिद्धों की आराधना करते हुए 128 अर्घ्य मंडल पर समर्पित किए गए। इस अवसर पर मुनि श्री के प्रवचन भी हुए। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनिश्री पूज्य सागर महाराज और क्षुल्लक अनुश्रमण सागर महाराज के सानिध्य में नेमिनगर जैन कॉलोनी में नौ दिवसीय सिद्धचक्रमंडल विधान का आयोजन किया जा रहा है। इस अवसर पर पांचवें दिन गुरुवार को धर्म सभा को संबोधित करते हुए अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज ने कहा कि सिद्धों की आराधना करने से रोग शोक के साथ मानसिक विकल्प दूर होता है।
फिर हम आत्म साधना में लीन होकर बिना प्रमाद के जो भक्ति करते हैं, वही भक्ति हमें सिद्ध बना देती है। जीवन में पाप कर्म के आने के 108 द्वार है, जिनके माध्यम से हम पाप का अर्जन करते हैं। इन पापों के द्वार बंद तभी होंगे, जब हम अपने अंदर के भावों को कषाय आदि से रहित होकर धर्म की आराधना करेंगे। धर्म और धर्मात्मा की निंदा के साथ सिद्धों की आराधना करेंगे तो सिद्धत्व की प्राप्ति कभी नहीं होगी बल्कि पाप का ही अर्जन होगा जो संसार परिभ्रमण का कारण बनेगा।
128 अर्घ्य किए गए समर्पित
इससे पहले गुरुवार को सिद्ध चक्र विधान की आराधना करते हुए मंडल पर 128 अर्घ्य समर्पित किए। भगवान की शांतिधरा करने का लाभ सुशीला, रोहित, राहुल जैन सिलवानी को प्राप्त हुआ। मुनि श्री का पाद प्रक्षालन अनिल शोभना जैन द्वारा किया गया। शास्त्र भेंट महिला मंडल द्वारा किया गया। सभा का संचालन समाज के महामंत्री गिरिश पाटोदी ने किया और आभार समाज अध्यक्ष कैलाश लुहाड़िया ने व्यक्त किया। विधि विधान का कार्य महेंद्र गंगवाल द्वारा किया गया।













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