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हर मनुष्य एक आत्मा है और हर आत्मा आनंद से भरपूर है, जरूरत समझने की

अपने 34वें चातुर्मास के लिए इंदौर पधारी आर्यिका पूर्णमति माताजी ने की शहर की तारीफ

 

 

इंदौर । आचार्य विद्यासागर महाराज की शिष्या आर्यिका पूर्णमति माताजी ससंघ का नगर आगमन हो चुका है। सकल दिगंबर जैन समाज द्वारा रविवार सुबह 7 बजे सत्यसाईं चौराहे से उनकी अगवानी की जाएगी। शहर में यह उनका पहला चातुर्मास है। इसके पहले वे 34 स्थानों पर चातुर्मास कर चुकी हैं। गुरु की आज्ञा पर अब तक 45 हजार किमी का पैदल विहार कर चुकीं आर्यिका पूर्णमति माताजी का कहना है, हर मनुष्य एक आत्मा है और हर आत्मा आनंद से भरपूर है। जरूरत है तो सिर्फ लोगों को उस आनंद को समझने की। सत्संग इसका माध्यम होते हैं, जहां आकर लोगों को आनंद और आत्मज्ञान की अनुभूति होती है और वह जीवन को एक नई दृष्टि से देख पाते हैं। ‘पत्रिका’ से विशेष चर्चा में माताजी ने आध्यात्म और अपने जीवन से जुड़े कई रोचक किस्सों के बारे में विस्तार से बताया। माताजी से चर्चा के प्रमुख अंश…।

 

सवाल: इस चातुर्मास के दौरान दिए जाने वाले प्रवचन किस विषय पर केंद्रित होंगे?

जवाब: लोगों की भावनाओं को देखते हुए ही प्रवचन दिए जाते हैं। कोई बनाया हुआ विषय नहीं होता। जिस प्रकार भूख लगने पर भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार लोगों की मनोस्थिति को भांपते हुए प्रवचन दिए जाते हैं। यदि लोगों में आपसी प्रेम की कमी है तो कैसे आपसी सूत्र में पिरोकर आपस में प्रेम, वात्सल्य में वृद्धि करें, उस पर प्रवचन होते हैं। बाहर की प्रसिद्धि व आत्मसिद्धी के लिए जी सकें, इसके लिए कोशिश कर सकते हैं। मुझे विश्वास है, यहां के लोग बहुत अच्छे हैं और उन्हें प्रवचन से शांति मिलेगी।

 

सवाल: आपका प्रवास इंदौर में पहले भी हो चुका है, अब कैसा बदलाव दिख रहा है?

जवाब: 35 वर्ष पूर्व मैंने कंचनबाग के उदासीन आश्रम में चार वर्ष रहकर धर्मशिक्षा ली थी। तब के इंदौर और आज के इंदौर में बहुत अंतर आ चुका है। वैसे समय के साथ व्यवहार में भी बदलाव आ जाता है। शहर कोई भी हो, सभी को खुशी चाहिए। सभी आत्माओं के अंदर खुशी निहित होती है, लेकिन सत्संग में आकर उन्हें खुशी मिलती है। फर्क सिर्फ दुनिया को अलग नजरिये से देखने की है।

सवाल: आपके चातुर्मास में क्या विशेषता है, जो समाजजन इतने उत्सुक हैं?

जवाब: चातुर्मास में व्यवहार, आचारण, विचार और आत्म शुद्धि होती है। चातुर्मास के जरिए हमारी कोशिश होती है कि लोगों में आध्यात्म को लेकर रूचि बढ़े। व्यवहार में सामंजस्य हो। विचार अच्छे हों और सभी मनुष्य आत्माएं ही तो हैं। सभी आदर से जीयें, आपस में प्रेम और वात्सल्य की भावना हो, ये हमारी मंशा होती है।

सवाल: जैन समाज के संगठनों में आपसी मनमुटाव की स्थिति क्यों बनती है?

जवाब: मुझे ऐसा नहीं लगता कि मनमुटाव है। फिलहाल पूरा समाज एक माला की तरह दिखाई दे रहा है। मोती छोटे-बड़े हो सकते हैं, लेकिन भाव सभी का समान होता है। सभी लोग भावनाओं से भरे हुए हैं। सभी भगवान के भक्त हैं। मनमुटाव तो दो भाइयों में भी देखने को मिलता है। फिर भी सत्संग को लेकर सभी उत्सुक हैं।

सवाल: धर्म और वैराग्य के प्रति आपका झुकाव कब और कैसे हुआ?

जवाब: मेरा सौभाग्य था कि बचपन से ही मुझे आचार्य विद्यासागर, उनके गुरु आचार्य ज्ञानसागर और उनके भी गुरु शिवसागर महाराज का सान्निध्य मिला। जब में साढ़े 4 वर्ष की थी, तब आचार्य शिवसागर महाराज को एक भजन सुनाया था। उन्होंने तभी कह दिया था कि यह बालिका निश्चित दीक्षा लेगी। उसके बाद मैंने दीक्षा लेने के बाद गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त किया।

सवाल: युवा पीढ़ी को आध्यात्म से जोड़ने के लिए आपके क्या सूत्र वाक्य हैं?

जवाब: जिसने आध्यात्म को मान लिया है, वहीं आध्यात्मिक है। मैंने अभी तक जो देखा है कि नई पीढ़ी आध्यात्म की ओर बहुत जल्दी आकर्षित होती है। आध्यात्म सीधे दिमाग में प्रवेश करता है। आध्यात्म जीवन को देखने का तरीका बदल देता है। आध्यात्म से जीवन को जीने की राह मिलती है। अच्छा सोचो और आनंद से जीयो, यही आध्यात्म है।

साभार-पत्रिका इंदौर

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