निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि देवों में कोई व्यसन नहीं होता इसलिए वह करते नहीं, मोक्ष का दरवाजा बन्द है क्योंकि तुम्हें मिला नही है, इसलिए तुम करते नही। नारकी को कुछ अच्छा मिलता ही नहीं, वे शुभ करे तो अशुभ होता है, उनको बन्द कर दिया। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
सागर। पशु कहता है कि मैं कुछ नहीं जानता, मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ, मेरी दृष्टि में अच्छा है इसलिए मैं कर रहा हूं। जब तुम्हें यह परिणाम आ जाए कि मैं जो कर रहा हूँ, सब अच्छा है, समझ लेना यही पशु का लक्षण है, यही असंज्ञी, विकलत्रय का लक्षण है। अब तुम मानव हो तो मानव का लक्षण है कि वह कभी अपनी इच्छा से कुछ नही करता। वह कहता है कि मुझे वही अच्छा है, जो मेरा गार्जियन अच्छा कहता है। मेरे मां-बाप, कुल, जाति, भगवान, गुरु, शास्त्र सब सही है, मैं सही नही हूं। यह परिणाम तुम्हारे अंदर जब आ जाए, समझ लेना तुम पशु से ऊपर उठ गए, मानव हो। मोक्ष की शुरुआत मानव से होती है, देव मोक्ष नहीं जा सकता। यह बात निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने प्रवचन में कही। उन्होंने कहा कि देवों में कोई व्यसन नहीं होता इसलिए वह करते नहीं, मोक्ष का दरवाजा बन्द है क्योंकि तुम्हें मिला नही है, इसलिए तुम करते नही। नारकी को कुछ अच्छा मिलता ही नहीं, वे शुभ करे तो अशुभ होता है, उनको बन्द कर दिया। भोगभूमि मनुष्य है, उनके कभी बुरा नहीं होता, सब अच्छा होता है। मात्र एक कर्मभूमि का मानव है जो न अपने पुण्य को अच्छा मानता हैं, कितने ही कर्म का उदय आ जाये, प्रकृति ने कहा सही वही है जिसकी गोदी में तुमने जन्म लिया, तू गलत है। मां-बाप सही है, मैं गलत हूं, यदि इतना सा भी नियम तुमने ले लिया तो इतना तो पक्का है कि तुम इस दुनिया में कभी बर्बाद नहीं हो पाओगे, शराब नहीं पी पाओगे, गुटखा नहीं खा पाओगे, इंसान बनो या न बनो लेकिन दानव नहीं बन पाओगे।
बच्चों को न दिखाएं वैभव
मुनि श्री ने कहा कि आप की अमीरी बेटे के अनुभव में नहीं आना चाहिए। बेटे को पढ़ते समय कभी भी अपनी अमीरी मत दिखाना, कभी तिजोरी मत दिखाना, वैभव मत दिखाना। तुम्हें बेटे को अच्छा बनाना है या अमीर बनाकर बिगड़े अय्याश बनाना है। यदि सही में रहीश बनाना है तो सारे माँ बाप अपने बेटे के सामने इतने गरीब बनना कि इतने इनकम टैक्स वाले के पास भी मत बनना। मेहनत के बल पर जो बड़े बनते हैं, बहुत गरीब होते हैं वो। उस गरीबी में से जो अमीर निकलता है, वो पसीने की कमाई होती है। भरत चक्रवर्ती के दीक्षा लेने के बाद उसका पुत्र अर्ककीर्ति वापस महल लौटकर आया तो 32 मुकुटबद्ध राजाओं ने नमस्कार करना बंद कर दिया, कोषाध्यक्ष ने कहा कि सारी निधियां खाली हो गईं, उधर 12 योजन की छलांग लगाने वाला घोड़ा 12 फीट की छलांग नही लगा पा रहा, वही रसोईयां है वही सब्जी है लेकिन अब भोजन में वो स्वाद नही रहा, एक अन्तर्मुहूर्त के बाद इतना परिवर्तन हो गया, इसलिए मत मानना कि बाप अमीर है तो तुम अमीर रहोगे, बाप के पास वैभव है तो तुम्हारा रहेगा, मत मानना बाप की जो इज्जत है वो मेरी रहेगी। बाप की इज्जत पाने के लिए तुम्हे उतनी मेहनत करनी पड़ेगी, जितनी तुम्हारे बाप ने की थी।
मां-बाप सबसे बड़े
उन्होंने कहा कि जिंदगी में यदि मां-बाप को छोड़ने का भाव आवे तो समझना तुममें पशु का लक्षण आ गया, मरने के बाद जीना तो मजबूरी है। मां-बाप जिंदा है और तू उनके बिना जीना चाहता है, उनकी आज्ञा, आशीर्वाद के बिना जीना चाहता है इसी का नाम पशु है। कोमा में है, बीमार है, बेहोशी में है, कैसे भी है मा-ंबाप के साथ मैं रहूंगा। यदि मानव हो तो आज प्रतिज्ञा कर लो कि मेरे मा-ंबाप जब तक जिंदा है मैं कभी इनसे अलग होकर जीने की कामना भी नही करूंगा, इनकी आज्ञा के बिना मैं कभी अपनी आज्ञा को बड़ा नहीं मानूगा। जो अपने मां- बाप का 25 साल का प्यार ठुकरा दे, ऐसों से शादी मत करना, कल वे तुम्हें छोड़कर दूसरे के साथ चले जायेंगे, जो अपनी मां का न हुआ वह तेरा क्या होगा। और सुनो छोकरों ऐसी छोरी अपने घर में मत लाना, जो अपनी मां की नहीं हुई, जो पिता को रुलाकर तेरे पास आ रही है, वह तुम्हें क्या सुख देगी, कुंवारे रह जाना लेकिन ऐसी छोकरी की शादी मत करना। उससे शादी करो जिस लड़की ने नियम लिया है कभी मैं मां-बाप के विरुद्ध जिंदगी में कोई कार्य नहीं करूंगा, मेरी शादी पर मां-बाप को दुख नहीं, खुशी होना चाहिए, ऐसी बेटी लाओ तुम्हारे घर में लक्ष्मी बनकर स्वर्ग बना देगी, ऐसा बेटा तुम्हारी जिंदगी में परमेश्वर का रूप बनकर आएगा।













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