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तीर्थों की वंदना से आत्मबल और तपोबल में वृद्धि: मुनिश्री विलोकसागर जी का 12 नवंबर की शाम मुरैना में भव्य मंगल प्रवेश


मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ वंदना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थों की वंदना करने से मनुष्यों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा तो मिलती ही है। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…


मुरैना। मुनिश्री विलोकसागरजी ने अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी तीर्थ में तीर्थ वंदना के महत्व पर प्रकाश डाला। मुनिश्री ने कहा कि तीर्थों की वंदना करने से मनुष्यों को आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा तो मिलती ही है। साथ ही उसके आत्मबल में वृद्धि भी होती है। जैन दर्शन में तीर्थ यात्रा का महत्व आत्म-खोज, आध्यात्मिक विकास और ज्ञान प्राप्ति से जुड़ा है। यह यात्रा भक्तों को तीर्थंकरों की शिक्षाओं से जोड़ती है और उन्हें जीवन के सत्यों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देती है। मुनिश्री ने कहा कि इन तीर्थ स्थलों पर जाकर, जैन अनुयायी शांति, संयम और मोक्ष का अनुभव करते हैं। जिससे उनके जीवन में पुण्य और शांति आती है। तीर्थयात्रा भक्तों को आत्म-खोज और आध्यात्मिक प्रगति के लिए प्रेरित करती है। यह तीर्थयात्राएं ज्ञान प्राप्त करने, ध्यान केंद्रित करने और आंतरिक शांति पाने का अवसर देती हैं। मुनिश्री आगे कहते हैं कि तीर्थयात्रा के माध्यम से भक्त तीर्थंकरों की शिक्षाओं और उनके जीवन से जुड़ते हैं। दान, संयम और क्षमा जैसे गुणों का पालन करते हुए तीर्थयात्रा कर्मों के बोझ को कम करने में मदद करती है।

धर्म, काम और मोक्ष इन तीनो की प्राप्ति में तीर्थ यात्राएं मददगार होती हैं। मानव का तीर्थयात्रा करने का उद्देश्य भी अलग-अलग होता है। सात्विक एवं संयमी मनुष्य अपने तपोबल में वृद्धि करने एवं मोक्ष प्राप्ती के लिए तीर्थ यात्रा करते हैं और सात्विक तथा राजसी प्रवृत्ति के मनुष्य शान शौकत और मनोरंजन के लिए तीर्थ यात्रा करते हैं। अधिकांशतः मनुष्य धर्म के लिए तीर्थ यात्रा करते है। सांसारिक प्राणियों को समय समय पर तीर्थ वंदना करते रहना चाहिए। जब भी आप तीर्थ वंदना पर जाएं, मन वचन काया की शुद्धि के साथ ही तीर्थ वंदना करें। तभी आपको सार्थक परिणामों की प्राप्ति होगी।

तीर्थ वंदना से मिलती है संयम की प्रेरणा 

इस अवसर मुनिश्री विबोधसागर महाराज ने बताया कि तीर्थ यात्रा करने से हमारा ज्ञान बढ़ता है, हम अपनी संस्कृति और रिवाजों से परिचित होते हैं। प्राचीन तीर्थ स्थलों पर जाने से पौराणिक ज्ञान बढ़ता है। अपने ईष्ट एवं महापुरुषों से जुड़ी कथाएं और परंपराएं मालूम होती हैं। प्राचीन संस्कृति को जानने का मौका मिलता है। तीर्थ जैसे पवित्र स्थलों की यात्रा त्याग, आत्मा की शुद्धि और आत्म-शुद्धि के शिखर तक पहुंचने के लिए अपनी आत्मा की गहराई में झांकने के लिए प्रेरित करती है।

युगल मुनिराजों ने किए भगवान शांतिनाथ के दर्शन

युगल मुनिराज पोरसा से पद विहार करते हुए जैन तीर्थ अतिशय क्षेत्र सिहोनियाजी पहुंचकर भूगर्भ से प्राप्त अतिशयकारी भगवान शांतिनाथजी, कुंथनाथजी, अरहनाथजी के दर्शन के साथ ही क्षेत्र के अन्य जिनालयों के दर्शन किए। उन्होंने सिहोनियाजी को अलौकिक एवं अदभुत तीर्थ बताते हुए संयम की साधना के लिए सर्वाेत्तम स्थान बताया।

अतिशय क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष टिल्लू जैन। उपाध्यक्ष नीलेश जैन, महामंत्री विवेक जैन, कोषाध्यक्ष रवि जैन, संजय जैन, मुकेश जैन, संजीव जैन, पिंटू जैन अम्बाह, बृजेश जैन दादा, सुनील जैन, राकेश जैन मुरैना ने विहार में सम्मिलित होकर गुरुदेव के क्षेत्र पर मंगल आगमन पर पाद प्रक्षालन कर भव्य अगवानी की।

12 नवंबर की शाम मुरैना में होगा भव्य मंगल प्रवेश

युगल मुनिराजों का आज रात्रि विश्राम ग्राम मिरघान में हो रहा है। बुधवार 12 नवंबर की आहारचर्या ग्राम खेरा में होगी और सामयिक के पश्चात बड़े जैन मंदिर मुरैना के लिए पद विहार होगा। दोपहर को नगर सीमा से युगल मुनिराजों को बैंडबाजों के साथ भव्य शोभायात्रा के रूप में शाम को मुरैना नगर प्रवेश कराया जाएगा।

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