समाचार

अमरकंटक जिनालय में राजस्थानी शिल्पकारों का अद्भुत कार्य: मंदिर का निर्माण बेहद सुदर्शनीय, निर्माण की तकनीक आदिकाल की


अमरकंटक में स्थित जिनालय में राजस्थानी शिल्पकारों में बहुत ही सुदर्शनीय कार्य किया है। मंदिर साढ़े चार एकड़ में बनाया गया है। भारत की प्राचीन पद्धति से बने जिनालय के मूलभवन में लोहे व सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…


इंदौर। अमरकंटक में स्थित जिनालय में राजस्थानी शिल्पकारों में बहुत ही सुदर्शनीय कार्य किया है। अमरकंटक पर्वतमाला के शिखर अमरकंटक में राजस्थान के बंसी पहाड़ के गुलाबी पत्थरों से ओडिशी शैली में निर्मित मंदिर के निर्माण को 22 साल हो गए हैं। मंदिर साढ़े चार एकड़ में बनाया गया है। भारत की प्राचीन पद्धति से बने जिनालय के मूलभवन में लोहे व सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है।

पत्थरों को तराशकर गुड़ के मिश्रण से आदिकालीन निर्माण की तकनीक का प्रयोग किया गया है। पत्थर पर 300 कारीगरों ने डिजाइन उकेरे हैं। आदिनाथ भगवान की अष्टधातु की प्रतिमा 24 टन की है। जिस कमल पर प्रतिमा है उसका वजन 17 टन है। शिलान्यास के समय लागत का आंकलन 60 करोड़ रुपए का था, जो बढ़कर 100 करोड़ हो गया। जबकि मंदिर का सिंहद्वार 51 फीट ऊंचा 42 फीट लंबा है। शिखर की ऊंचाई 151 फीट है। भगवान आदिनाथ मंदिर के समक्ष बने मानस्तंभ सहस्त्रकूट जिनालय में 1008 प्रतिमाएं है।

जहां भगवान आदिनाथ विराजित हैं। उनके साथ परम्परानुसार अष्टमंगल चिह्न भी उत्कीर्ण किए गए हैं। प्रतिमा का आभामंडल विशाल है। दांए-बांए चंवरधारिणी तथा इनके ऊपर मंगल कलश स्थापित है। द्वार शाखाओं एवं सिरदल पर कमल पुष्पांकन है। प्रतिमा के वक्ष स्थल पर जैन प्रतिमा लांछन श्री वत्स बना हुआ है। अष्टधातु की प्रतिमा की ढलाई उन्नाव कानपुर में, जबकि कमल आसन को अहमदाबाद में ढाला गया है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
2
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page