अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के सातवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 224 अर्घ्य चढ़ाए गए। इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि यदि अरिहंत देव,शास्त्र, गुरु की भक्ति करते समय कोई और चिंतन आ जाए तो समझ लेना आप भगवान भक्ति से अभी नहीं जुड़े हो। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के सातवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में अर्घ्य चढ़ाए गए। सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक व शांति धारा का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक ओमप्रकाश मीना जैन, मनु श्रीनगर और विकास पायल रारा, गिरीश नीता रारा, संदीप यशस्वी जैन, गुवाहाटी वालो को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 24 काव्यों के साथ 1344 अर्घ्य समर्पित किए गए।
आचार्य अभिनंदन महाराज के चित्र अनावरणकर्ता व दीप प्रज्वलनकर्ता ओम प्रकाश मीना जैन, मनु श्रीनगर रहे। अंतर्मुखी परम पूज्य मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के पाद प्रक्षालन धन सिंह जैन पिड़ावा वाले ने किया। शास्त्र भेंट का सौभाग्य मयंक कुमार जैन ओम प्रकाश मीना जैन को प्राप्त हुआ।
संत-पंथ के झगड़ों में न फंसें
इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि तत्वार्थ सूत्र के मंगलाचरण में कहा गया है “मोक्ष-मार्गस्य नेतारं, भेत्तारं कर्म-भूभृताम्। ज्ञातारं विश्व-तत्त्वानां, वन्दे तद्-गुण-लब्धये” अर्थात अरहंत भगवान के वितराग, सर्वज्ञ, हितोपदेशी इन तीन गुणों की प्राप्ति के लिए में उन्हें नमस्कार करता हूं।
यदि अरिहंत देव,शास्त्र, गुरु की भक्ति करते समय कोई और चिंतन आ जाए तो समझ लेना आप भगवान भक्ति से अभी नहीं जुड़े हो। यदि देव, शास्त्र, गुरु को देखने के बाद भी संत और पंथ का भूत अगर जागृत होता है तो वह व्यक्ति संसार में परिभ्रमण की ओर अग्रसर हो जाता है और वह परमात्मा पद को प्राप्त नहीं कर सकता।
आचार्य भगवन कहते हैं कि व्यक्ति धर्म के नाम पर किसी एक संत और उनकी ही परंपरा को या एक पंथ और उसी की परंपरा को अपनाता है बाकी सब को समझता है कि पाप है, वह मूलगुण धारी नहीं है तो ऐसा व्यक्ति एकांत मिथ्यात्व का दोषी होता है। एक साधु कुछ और कहता है दूसरा साधू कुछ और, समाज भी अलग-अलग चर्चाएं करते हैं तो हम जैन धर्म की हत्या कर रहे हैं, उसका नाश कर रहे हैं।
आज के इस युग में सब अपने-अपने अनुसार मां जिनवाणी का रसपान कर रहे हैं तो मुझे ऐसा लगता है कि महाभारत में तो द्रोपदी का एक बार चीरहरण हुआ था लेकिन यहां मां जिनवाणी का बार-बार चीरहरण हो रहा है। जो संत, पंथ और मां जिनवाणी को झगड़ों से, राग द्वेष से दूर रखें वही सच्चे संत हैं क्योंकि इस संत और पंथ के चक्कर में समाज की एकता अखंडता टूट रही है। मुनि श्री ने कहा कि अरे हमारा धर्म तो वह धर्म है जिसमें शास्त्रों में कहा है कि राम ने अपने शत्रु रावण का भी दाह संस्कार विधि विधान से किया और अपने भाई को शत्रु से ज्ञान लेने को भेजा। हमारा धर्म ऐसा है जिसमें शेर के मन में भी दया आ गई और वह भी जानवर पर्याय को छोड़कर इंसान पर्याय में भगवान महावीर के रूप में आए। जो इंसान को भी जानवर बना दे, वह संत, पंथ, मां जिनवाणी हमारे किसी काम की नहीं है।
अभी कुछ दिनों पहले की ही बात है, मुनि विनम्र सागर जी महाराज ने कहा कि अभी हम चार भाई थे और मुनि पूज्य सागर को देखकर ऐसा लगा की मुझे एक नया भाई मिल गया और अब हम पांच भाई हो गए हैं। ऐसा कहकर मुनि श्री ने समाज में एक सूत्र में जोड़ने का संदेश दिया है। इसी के विपरीत अगर संत और पंथवाद यूं ही चलता रहा तो महावीर के पंथ को उनकी वाणी को कौन संभालेगा।
यह बड़ा ही विचारणीय प्रश्न है। संत और पंथ के झगड़ों में आज हम अशुभ कर्म का बंध कर रहे हैं और आज हमारे समाज, मंदिर भी सुरक्षित नहीं रह पा रहे हैं। और जब अशुभ कर्म का उदय आता है तो यही संत, यही पंथ, यही जिनवाणी माता भी हमारे इस कर्म के उदय को रोक नहीं पाते। इसलिए मात्र अहिंसा पंथ की बात करें और 28 मूल गुण संत की बात करें इस संत और पंथ के झगड़ों में न फंसें।














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