जब-जब तुम धर्म करने आओ, यह तय मानो कि जीवन में कष्टों की बाढ़ आ जाएगी।यह उद्गार मुनि श्री सुधासागर जी ने अशोकनगर प्रवास के दौरान व्यक्त किए। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन मौजूद रहे। अशोकनगर से पढ़िए राजीव सिंघई मोनू और शुभम जैन की यह खबर…
अशोकनगर। जब-जब तुम धर्म करने आओ, यह तय मानो कि जीवन में कष्टों की बाढ़ आ जाएगी।यह उद्गार मुनि श्री सुधासागर जी ने अशोकनगर प्रवास के दौरान व्यक्त किए। मुनिश्री ने अपने प्रबोधन में कहा कि सुख यदि सतत मिले तो उसका मूल्य समाप्त हो जाएगा। जैसे रात के बिना प्रातः का सौंदर्य अधूरा है, वैसे ही दुःख के बिना जीवन की पूर्णता नहीं। मुनिश्री ने जीवन की कठोर सच्चाई को सरल शब्दों में समझाते हुए कहा-जो गाली देता है, उसे निंदक नहीं, बल्कि हमारे धैर्य का परीक्षक मानो। निंदा अज्ञानी करेगा, लेकिन प्रशंसा ज्ञानी करेगा।
राम नहीं बनते अगर दुख न सहते
मुनिश्री ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि श्रीराम के जीवन में वनवास, वियोग और संघर्ष न आते तो वे पूज्य नहीं होते। दुःख ही उन्हें राम बना गया। उन्होंने कहा कि “सच्चा भक्त वही है, जो भगवान या गुरु के जीवन को अपने जीवन में ढाल ले। माता-पिता, भाई-बहन और जीवनसाथी के सुख-दुःख को स्वयं का मानने वाला ही सच्चा रिश्तेदार होता है।
धर्म से सुख नहीं, सहनशीलता आती है
मुनिश्री ने साफ शब्दों में कहा कि धर्म से सुख नहीं मिलता, दुख सहने की शक्ति मिलती है। तुम अच्छे साधु बनना चाहते हो तो पहले खुद को दुख झेलने के लिए तैयार करो। उन्होंने कहा कि साधु वह नहीं जो कष्टों से भागे, बल्कि वह है जो कष्टों को समता से झेले। प्रवचन में मुनिश्री ने समाज को एक नई सोच दी कि जब सुख मिले, तब प्रभु को कुछ लौटाओ। दुःख में तो सभी मंदिर आते हैं, लेकिन सुख में प्रभु के द्वार जाना, यह सच्ची श्रद्धा है। ऐसा जीवन बनाओ कि तुम्हारे स्पर्श, दर्शन, शब्द और स्मरण से लोगों का कष्ट मिटे। यही है साधुता। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे, जिन्होंने मुनिश्री के उद्बोधनों को श्रवण कर जीवन के नए दृष्टिकोण प्राप्त किए।













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