धर्म का संगीत तो जोरों पर चल रहा है लेकिन श्रावकों में उत्साह नहीं दिखाई दे रहा बल्कि श्रावकों में चर्चा बिगड़े सुर-ताल की हो रही है। कोई सुर-ताल ठीक करने की कोशिश में लगा हुआ है लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला। पढ़िए दीपक जैन, ग्रुप संपादक, श्रीफल जैन न्यूज की विशेष अपील
संगीत में सुर-ताल का मेल न हो तो संगीत सुनने में आनंद नहीं आता है और सुनने वालों का उत्साह भी नहीं होता है। इंदौर शहर के जैन समाज के भी अभी कुछ कुछ सुर-ताल बिगड़े हुए लग रहे हैं। धर्म का संगीत तो जोरों पर चल रहा है लेकिन श्रावकों में उत्साह नहीं दिखाई दे रहा बल्कि श्रावकों में चर्चा बिगड़े सुर-ताल की हो रही है। कोई सुर-ताल ठीक करने की कोशिश में लगा हुआ है लेकिन अभी तक कोई परिणाम नहीं निकला। कोई मौन बैठकर जैसा चला रहा, उसी में मग्न हो रहा है और कोई सुर-ताल को ठीक ही नहीं होने देना चाहता। कोई ऐसा भी है, जो सुर-ताल अच्छे हों या बिगड़े… जैसे हैं बस वैसे में नाचना चाहता है। इन सब के बीच फर्क पड़ रहा है तो इंदौर के जैन समाज को।
कभी यहां के सुर-ताल इतने अच्छे थे कि भारत के हर शहर में इसी मधुर गूंज के सब दीवाने थे। सुर-ताल के बिगड़ने से धार्मिक मधुर संगीत की आवाज अब दबी-दबी से लग रही है। इंदौर जैन समाज का कोई भी सुर-ताल ठीक करना नहीं चाहता। लग तो ऐसा रहा है कि जैसे सब अपने-अपने व्यक्तिगत सुर-ताल ठीक करने में लगे हैं। सुर ताल के बिगड़ने से संगीत का महत्व नहीं होता, ऐसा ही कुछ हाल इंदौर के जैन समाज का हो गयाहै। न जाने कितने नए-नए सुर-ताल बन रहे हैं। इन सुर-तालों में प्राचीन सुर-ताल अपना अस्तित्व बचाने में लगे हैं। ईश्वर से प्रार्थना है कि जल्दी मधुर संगीत सुनाई दे। तभी इंदौर जैन समाज में धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व रहेगा।
याद रखें, पहले से अधिक अगर सुर-ताल बिगड़े तो उसका जिम्मेदार वही होगा, जो नए-नए सुर-ताल बनाने में लगा हुआ है।













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