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अंधेरी रात के बाद जब प्रकाश मिलता है: मुनिश्री सुधासागर जी के प्रवचनों में धर्मज्ञान का बिखर रहा आलोक 


मुनिश्री सुधासागर जी के विहार के दौरान प्रवचनों का दौर जारी है। मंगलवार को गुना जिले के शाढोरा में मुनिश्री ने धर्म देशना दी। जिसका वहां की धर्मानुरागी जनता ने बड़े मनोभावों से उसे अपने अंतस में ग्रहण की। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। शाढोरा से पढ़िए, राजीव सिंघई की यह खबर…


शाढोरा,( गुना)। मुनिश्री सुधासागर जी के विहार के दौरान प्रवचनों का दौर जारी है। मंगलवार को गुना जिले के शाढोरा में मुनिश्री ने धर्म देशना दी। जिसका वहां की धर्मानुरागी जनता ने बड़े मनोभावों से उसे अपने अंतस में ग्रहण की। मुनिश्री के प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र होकर पुण्यार्जन कर रहे हैं। इस अवसर पर मुनिराज ने कहा कि यह मत समझना कि जहां तुम्हें कष्ट है, दुख है, वहां तुम्हारा अशुभ दिन है। कष्टों के बीच से भी कई बार शुभ शगुन निकलता है। रात को तुम अंधेरी रात मत मानो, वो रात प्रातः काल की तैयारी है।

जहां रात नहीं होती, वहां प्रातः काल नहीं होता, शगुन नही होता, शुभबेला नहीं होती। कुछ देश ऐसे हैं जहां रात नहीं होती, 6-6 महीने तक दिन ही बना रहता है। ज्योतिष शास्त्रों में लिखा है कि जहां सदा उजेला बना रहता है, वहाँ कभी शगुन, शुभ नहीं होता, उनका जीवन मंगलमय नहीं होता। अंधेरी रात के बाद जब प्रकाश मिलता है, वह प्रत्युषकाल, प्रातःकाल शगुन माना जाता है। उस सूर्य को जो शुभ बनाया है, रात ने बनाया है। इसी प्रकार ये मत समझना तुम्हारा जीवन दुःखमय है, तुम परेशान हो तो तुम्हारा भविष्य अंधकारमय है ऐसा नहीं। अंधकार की रात्रि के समान कई बार जीवन में आये हुए दुःख, कल के लिए शगुन बन जाते है।

भोजन का महत्व नहीं है, परोसने वाले का महत्व है

माँ यह नहीं सोचती है कि बेटे को क्या अच्छा लग रहा है? माँ यह सोचती है कि बेटे का हित किसमें है? बस यही है धर्म और विज्ञान का अंतर, विज्ञान वो वस्तु है जो तुम्हें अच्छा लगता है, हमें कोई लेना-देना नहीं, तुम्हारा भविष्य अच्छा हो या न हो। ऐसी दवाई देता हूँ जिससे पाव भर किलो की लौकी, रात भर में 5 किलों की हो जाएगी। धर्म कहता है कि नहीं, तुम माँ हो, तुम्हें वह उपदेश देना है, जो इनके लिए हितकारी हो। जो चीज तुम्हें अच्छी लग रही है, मन को, इन्द्रियों को, आँखों को, कानों को, मत समझ लेना कि यह तुम्हारे लिए हितकारी होगी। जो वस्तु तुम्हें अच्छी नहीं लग रही है तो यह विचार करना इसको देने वाला कौन है? भोजन किसने बनाया है, यदि पता चले कि माँ ने बनाया है तो आँख बन्द करके खा जाना, इसी में तुम्हारा कल्याण है। हमारे यहाँ भोजन का महत्व नहीं है, परोसने वाले का महत्व है। ठीक दवाई से होना है लेकिन खोज वैद्य करना है। ऐसे ही धर्म को नहीं समझना है, धर्म गुरु को समझ लो।

इंद्रिय के जो विषय अच्छे लगते हैं

तुम्हारा मंदिर जाने का मन नहीं करें तो बस इतना पूछ लेना कि यह मंदिर जाने का आदेश किसने दिया है? यदि तुम्हें पता चले कि ये आदेश मेरे गुरु ने दिया है, मेरे भगवान ने दिया है तो मन न लगे तब भी चले जाना, इसी मैं तुम्हारा कल्याण है। व्रत और धर्म प्रायः संसारी प्राणी के अरुचिकर होते हैं। इंद्रिय के जो विषय होते है वे संसारी व्यक्ति को अच्छे लगते है और धर्म इंद्रियों का विषय है नहीं, इसलिए रुचिकर नहीं लगता, इसलिए वहाँ आदेश दिया कि रुचि-अरुचि मत देखों, सामने कौन है?

हम हवाओं को गंदा नहीं करेंगे तो ऑक्सीजन बन जाएगी

सारे भारत के लोग नियम ले ले कि हम नदियों को गंदा नहीं करेंगे तो नदी तुम्हारे लिए वो जल देगी कि तुम्हारी बीमारियां दूर हो जाएंगी। हमें यह सोचना है कि हम हवाओं को गंदा नहीं करेंगे, हवाएं ऑक्सीजन बन जाएगी। हमें क्या अच्छा लग रहा है हम यह ही नहीं सोचें, यह भी सोचें कि पड़ोसी को क्या अच्छा लगता है। हम यह नहीं सोचें कि हमें क्या अच्छा लगता है, हम यह भी सोचें कि मेरे माँ बाप को क्या अच्छा लगता है, मेरे गुरु को क्या अच्छा लगता है, मेरी पत्नी को क्या अच्छा लगता है और पत्नी सोचें कि मेरे पति को क्या अच्छा लगता है। यदि ऐसा संसार हो जाए तो हर व्यक्ति एक दूसरे की सोच रहा होगा।

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