दोहों का रहस्य समाचार

दोहों का रहस्य -131 व्यक्ति को चाहिए कि वह बुरे वातावरण में भी अपने गुण, संयम और विवेक को बनाए रखे : हमारा मन शांत, स्थिर और ईश्वर में स्थित है, तो वही सच्ची साधुता है


दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 131वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…


“चंदन जैसा साधु है, सर्प हि सम संसार।

वाके अंग लपटा रहे, मन में नाही विकार॥”


इस दोहे में कबीरदास जी एक सच्चे साधु की विशिष्टता और आंतरिक निर्मलता को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत करते हैं।

 

वे कहते हैं कि साधु (सज्जन व्यक्ति) चंदन के समान होता है — शीतल, सुगंधित और शांत।

वहीं यह संसार सर्प के समान है — क्रूर, विषैला, स्वार्थी और प्रपंचमय।

 

फिर भी जैसे सर्प चंदन से लिपटा रहता है, पर चंदन की शुद्धता या सुगंध को प्रभावित नहीं कर पाता,

उसी तरह एक सच्चा साधु संसार की बुराइयों, विकारों और प्रलोभनों से घिरा होने के बावजूद भी अपने मन में विकार उत्पन्न नहीं होने देता।

दोहे का भावार्थ:

संसार में मोह, माया, ईर्ष्या, लोभ, द्वेष, छल-कपट जैसे सर्प हैं,

जो हर ओर फैले हुए हैं।

लेकिन सच्चा साधु, भले ही उनके संपर्क में हो, उनसे लिपटा हो,

फिर भी अपने भीतर ईश्वर की भावना, प्रेम, करुणा और सेवा-भाव को बनाए रखता है।

एक सच्चा साधक कौन?

एक सच्चा साधक वह है —

जो संसार में रहते हुए असंसारी बना रहता है,

 

जो निंदा, आलोचना और विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और संतुलन नहीं खोता,

 

जो दूसरों के दोषों से स्वयं दोषी नहीं बनता,

जो अपने धर्म, विवेक और आत्मा की शुद्धता को नहीं त्यागता।

कबीर का संदेश:

कबीर इस दोहे के माध्यम से हमें यह सिखाते हैं कि:

“महानता का मापदंड यह नहीं कि आप कितने अच्छे माहौल में हैं,

बल्कि यह है कि आप विकारों के बीच रहकर भी कितने निर्मल रह सकते हैं।”

जीवन में चाहे परिस्थितियाँ विषैली हों,

लोग कटु हों, या वातावरण प्रतिकूल हो —

यदि हमारा मन शांत, स्थिर और ईश्वर में स्थित है,

तो वही सच्ची साधुता है।

प्रेरणा:

व्यक्ति को चाहिए कि वह बुरे वातावरण में भी अपने गुण, संयम और विवेक को बनाए रखे।

आत्मा मूलतः शुद्ध है; यदि मन पर नियंत्रण हो और विवेक जागृत हो,

तो संसार का कोई भी विकार आत्मा को दूषित नहीं कर सकता।

अंत में:

सच्चा साधक चंदन की तरह होता है —

संसार की विषैली बेल उसके चारों ओर लिपटी हो,

फिर भी वह केवल सुगंध ही देता है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

You cannot copy content of this page