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निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी तुम जैसा ही निज को पाऊं: भक्तिभाव से परिपूर्ण काव्य रचना में प्रभु जी के प्रति समर्पण का हेतु 


प्रभु भक्ति की महिमा भी बड़ी न्यारी है। समर्पण भाव से आत्म कल्याण की भावना से की गई भक्ति का सुफल जल्द मिलता है। भक्ति की प्रकृति भी निज का कल्याण ही करती है। इन्हीं भाव से लिखी यह काव्य रचना श्रीफल जैन न्यूज पर पढ़िए….


प्रभु भक्ति (सोनागिर)

 

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

 

दृष्टि नासा पर धारी है,

दृष्टि नासा पर धारी है

वीतराग छवि अति प्यारी है

तुम जैसा ही में हो जाऊं

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

 

वीतराग छवि है कितनी निराली

आनंद अमृत सुख रस वाली

जिसको में भी पीना चाहूं

तुम जैसा ही में हो जाऊं

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

 

अंदर में आनंद बरसते

सुख के सागर केलि करते

किसको और क्या ही बताऊं

तुमरी महिमा गाता जाऊं

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

 

जिसको तुमने पी कर पाया

आनंद अमृत कहां से आया

इसको भी तुम ने बतलाया

इसी विधि को में भी अपनाऊं

निरखत तुमको जब मैं प्रभु जी,

तुम जैसा ही निज को पाऊं

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