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धर्मसभा में दिए प्रवचन : बड़े लोग जब प्रशंसा करें तो समझना ये आग है : निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज


हम अच्छाई को समझें या ना समझें, हमें बुराई का ज्ञान होना चाहिए। हम कितने ही गुण लेकर बैठे रहें, एक अवगुण सारे गुणों को गन्दा कर देता है। हजार खुशियां जिंदगी भर हंसा सकेंगी या नहीं लेकिन एक गम जिंदगी भर रुला सकता है। व्यक्ति की जिंदगी में एक व्यसन आ जाए, संसार के सारे गुण रख दिए जाये, वे सब गुण अवगुण में परिवर्तित हो जायेंगे। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…


सागर। हम अच्छाई को समझें या ना समझें, हमें बुराई का ज्ञान होना चाहिए। हम कितने ही गुण लेकर बैठे रहें, एक अवगुण सारे गुणों को गन्दा कर देता है। हजार खुशियां जिंदगी भर हंसा सकेंगी या नहीं लेकिन एक गम जिंदगी भर रुला सकता है। व्यक्ति की जिंदगी में एक व्यसन आ जाए, संसार के सारे गुण रख दिए जाये, वे सब गुण अवगुण में परिवर्तित हो जायेंगे। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा में कही। उन्होंने कहा कि व्यसन अलग चीज है और पाप अलग चीज है, तो पाप इतना खतरनाक नहीं है, व्यसन खतरनाक है, इसलिए जैनाचार्यों ने 5 पापों की व्याख्या अलग की और व्यसनों की व्याख्या अलग की। पाप कोई बड़ी चीज नहीं है, पाप तो छूट जाते है, व्यसन नहीं छूटते। पाप लत नहीं बनाता, व्यसन लत बनाता है। पाप का ज्ञान होने के बाद पाप छूट जाता है, व्यसन का ज्ञान होने के बाद भी व्यसन छूटता नही है।

प्रशंसा सुनने का भाव मत रखो

उन्होंने कहा कि सारी दुनिया पाप क्यों कर रही है क्योंकि वह उसे पाप मानती ही नहीं है। यानी जो पाप को पाप मानकर नहीं करे तो क्या वो व्यक्ति पापी नहीं है क्या? शेर भले भोजन कर रहा है लेकिन पाप हो रहा है तो वह पापी की कोटि में आएगा। जाने अनजाने में कैसे भी करो, पाप तो पाप ही रहेगा। धर्म क्रिया के लिए किया हुआ पाप भी पाप है भली उसमे पुण्य का बंध नही होगा। फिलॉस्फर, डॉ. और गुरु ये तीन कभी अच्छाइयां नहीं देखते। जब जब तुम्हारे मन में भाव आ जाए कि मैं गुरु से प्रशंसा सुनना चाहता हूं, नोट कर लेना तुम्हारा अशुभ दिन चालू हो गया और यदि गुरु के मन मे भाव आवे, तुम्हारे अंदर गुण भी है, दुर्गुण भी है, यदि गुणों की प्रशंसा का भाव आवे समझ लेना गुरु के अंदर तुम्हें मिटाने का भाव आ गया। प्रशंसा एक आग की भट्टी है, जिसमें अपने दुश्मन को डाल दो, जलकर राख हो जाएगा। बड़े लोग जब प्रशंसा करें तो समझना ये आग है और तुम आग की भट्टी में जा चुके हो, अब तुम बच नहीं सकते, इसलिए जब तुम्हारा सम्बन्धी, तुम्हारा गार्जियन, तुम्हारा हितैषी तुम्हारी प्रशंसा करे तो तुम कभी उसे अच्छा मत मानना, तुरंत सोचना जरूर मेरे से गलती हो गयी है जो अक्षम्य गलती है, मेरे कौन से पाप के उदय है जो गुरु महाराज आज मेरी प्रशंसा कर रहे हैं।

अच्छे कार्य के खुद को दांव पर लगा दो

मुनि श्री ने कहा कि यदि तुम्हें कभी पता चल जाए कि तुम्हारे घर का, समाज का मुखिया पापी है तो जितनी झूठी प्रशंसा करोगे, पापी से उतने ही पुरस्कार पाओगे। श्रीराम जब वनवास गए तब उन्होंने सीता जी जी से कहा था कि मेरे जाने के बाद कभी तुम मेरी प्रशंसा मत करना, कभी भरत की बुराई मत करना, माता केकई की बुराई मत करना, मेरे जाने के बाद मंथरा को दोषी मत कहना। मूर्ख के राज्य में जीना, मूर्ख से मोर्चा लेना अपना सर्वनाश करना है, अयोध्या जहाँ तीर्थंकरो का जन्म हुआ, वहाँ बलभद्र को भी ठोकरे लगा दी एक तुच्छ दासी के दिमाग ने। जब कोई अच्छा व्यक्ति भी जिसका सलाहकार व्यसनी हो, बुद्धिहीन हो, व्यसनी हो, निकृष्ट हो, दास हो, नौकर हो उससे सावधान रखना वह तुम्हारी छोटी सी चूक पर तुम्हारा सर्वनाश कर देगा। जो घर में तुम्हारी बड़े हैं उनको एक ही बात कह देना अच्छे कार्य के लिए मेरे से पूछने की जरूरत नहीं, आप धन तो क्या, मुझे भी दांव पर लगा दो तो भी मैं कुछ कहने वाला या कहने वाली नहीं हूं। कैसा घर था वो, धर्मराज ने भाइयों से नहीं पूछा कि मैं तुम्हे दांव पर लगा रहा हूं, यहां तक दौपदी को दांव पर लगाने के पहले किसी से नहीं पूछा, ऐसे ही नही पांडवों की जयजयकार हो गयी। ये तो गलत कार्य की बात थी, हम तो धर्म कार्य की बात कर रहे है।

साधु न चलें गृहस्थों की सलाह पर

उन्होंने यह भी कहा कि कम से कम पंचमकाल में घरों में इतना हो जाए हर छोटा आदमी कहे धर्म कार्य के लिए हमसे पूछने की जरूरत नहीं, हम उलाहना नहीं देंगे, बल्कि तुम मेरे बिना पूछे करोगे तो मेरे अहोभाग्य है कि तुमने मुझे सम्मान दिया। बाप भी यदि बेटे से बिना पूछे दान दे देवे तो बेटे को पिता के पैर छूना चाहिए, पिताजी आपने मेरे इतना सम्मान किया महाराज के सामने और ये दिखा दिया कि अभी इस घर मे बाप की चलती है और जिस घर में बाप की चलती है उस घर का कभी विनाश नहीं हो सकता। ये नीति है- संकट में पड़े रहना लेकिन कभी स्त्री की सलाह से संकट मुक्त मत होना क्योंकि यह संकट रूपी कुंए से तो निकाल देंगी लेकिन बाद में खाई में पटक देगी, इसकी जिम्मेदारी नही। साधु गृहस्थों की सलाह पर मत चलना क्योंकि जिस साधु का सलाहकार गृहस्थ होगा उसकी साधुता एक न एक दिन संकट में पड़ेगी। जो जो बड़े हैं वे छोटो को खुश करने के लिए कभी प्रशांत मत करना, अन्यथा तुम बड़े कहलाने लायक नहीं है तुम उसके दुश्मन हो।

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