अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर जी महाराज ने चातुर्मास के दूसरे पड़ाव के नौवे दिन हाई लिंक सिटी पर धर्म सभा में कहा की आज हम अपनी संस्कृति और संस्कारो को नष्ट करते जा रहे है। कार्यक्रम में 12 दिन चलने वाले भक्तामर महामंडल विधान के नौवे दिन 280 अर्घ्य भक्तिभाव पूर्वक अर्पित किए गए। पढ़िए स्मिता लखावत की यह विशेष रिपोर्ट…
इंदौर। अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज के चातुर्मास धर्म प्रभावना रथ के दूसरे पड़ाव के नवें दिन हाई लिंक सिटी में बड़ी भक्ति भाव से भक्तामर महामंडल विधान में 280 अर्घ्य चढ़ाए गए। महेंद्र पहाड़ियां और संजय बड़जात्या ने बताया की सर्वप्रथम जिनेंद्र भगवान के अभिषेक, शांति धारा , मुनि श्री के पाद प्रक्षालन, शास्त्र भेंट दीप प्रज्वलन, चित्र अनावरण करने का सौभाग्य आज के भक्तामर महामंडल विधान के पुण्यार्जक पंकज, प्रियंका, प्रियंक, प्रज्वलन जैन को प्राप्त हुआ। तत्पश्चात नित्य नियम पूजन के साथ भक्तामर महामंडल विधान में आज कुल 34 काव्यों के साथ 1904 अर्घ्य समर्पित किए गए।
हम सभी दूसरों के सुख से दुखी
इस अवसर पर मुनि श्री ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज हम दूसरों को सुखी देखकर दुखी हैं। अपने आप से कोई इस संसार में दुखी नहीं है। आज जो आत्महत्या हो रही है, वह भी दूसरों के साथ तुलना करने से हो रही है।
उसके इतने नंबर आए, तुम्हारे कम क्यों आए…इस प्रकार से माता-पिता अपने बच्चे की तुलना पास के बच्चे से करते हैं तो बच्चा अपने आप को कमजोर समझता है, अपनी बेइज्जती समझता है और तनाव में आकर अपने आप को संसार से दूर करना चाहता है।
व्यापार में भी ऐसा ही है, जब हम दूसरों की बराबरी करना चाहते हैं तो उसे हराने के लिए अपनी शक्ति लगाते हैं पर यही तनाव आत्महत्या का कारण बनता है, इसके उलट हमें तो अपने आप को और अच्छा व कामयाब बनाने के लिए निरंतर पुरुषार्थ करते रहना चाहिए।
आज हम जो कपड़े पहन रहे, जो खाना खा रहे, वह भी दूसरों के लिए कर रहे हैं। घर में तो हम बनियान में भी रह जाते हैं, अपना काम कर लेते है । 10 व्यक्ति सूखी रोटी खाते हैं एक साथ तो वह भी खाने में आनंद आता है पर दस में एक घी वाली रोटी खा ले तो अब वह सूखी रोटी अच्छी नहीं लग रही है क्योंकि एक घी वाली खा रहा है।
आज हमारे बच्चे तो अपनी संस्कृति और संस्कार भूल कर पाश्चात्य संस्कृति में जी रहे हैं, उसी को स्टैंडर्ड मान कर जी रहे हैं पर वास्तव में तो यह हो रहा कि हम अपनी संस्कृति और संस्कारों को नष्ट करते जा रहे हैं। आज न तो पहने और खाने का कोई ढंग रहा है और न माता-पिता के प्रति आदर सत्कार रहा और न ही सम्मान।
आज तो यह भी कह देते हैं कि हम अपनी जिंदगी जीना चाहते हैं, जमाना बदल गया है, हम अपने हिसाब से जीना चाहते हैं। दूसरे देश की संस्कृति और संस्कार के कारण क्या हो रहा। पहले हम एक सूत्र में बंधे थे।
एक साथ 50 लोग रहते थे और एक रसोई में खाना बनता था, एक-दूसरे का आदर करते थे, परिवार की मर्यादा का ध्यान रखते थे, एक- दूसरे के दुख में एक दूसरे के साथ खड़े रहते थे। अब तो एक घर में रहकर भी एक- दूसरे के प्रति मर्यादा, सहयोग जैसे भाव ही नहीं रहे, बस अपने लिए जीना चाहते हैं।।













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