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अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना से ही हिंसा मिटाई जा सकती है : मुनि श्री प्रमाणसागर जी ने पद्मपुराण के अंशों का वाचन कर दी मंगल देशना 


अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, यह खबर…


अवधपुरी (भोपाल)। अधर्म पर धर्म की,असत्य पर सत्य की, बुराई पर अच्छाई की, पाप पर पुण्य की,अत्याचार पर सदाचार की, अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है यह दशहरा। यह उदगार मुनि श्री प्रमाणसागरजी महाराज ने प्रातः प्रवचन सभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जब-जब हमारी आत्मा किसी अन्य पर मुग्ध होती है तो वह विवेक (अंतरात्मा) की बात को सुना अनसुना कर अविवेक की ओर चल देती है। मुनि श्री ने जैन रामायण पद्ममपुराण के अंशों को सुनाते हुए सीता हरण के दृश्यों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि श्रीराम जानते थे कि मृग सोने का नहीं होता फिर भी जब बार-बार सीताजी ने कहा कि जाओ उस स्वर्ण मृग को लेकर आओ तो रामजी उस स्वर्ण मृग को लेने उसके पीछे जाना पड़ा और जंगल में जाते ही वह मायावी मृग गायब हो गया। वही माया के माध्यम से लक्ष्मण बचाओ की आवाज सुनकर सीता जी ने लक्ष्मण को भी उधर ही भेज दिया, आगे की कथा आप सभी जानते हैं।

अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ 

मुनि श्री ने कहा कि जब-जब मर्यादा की लक्ष्मण रेखा से सीता बाहर गई है। उनका अपहरण ही हुआ है। आज हर व्यक्ति अपनी सीमाओं को लांघ रहा है और अपने अंदर की सीता (शांति) का हरण कर रहा है। उन्होंने आध्यात्मिकता के पक्ष को जगाते हुए कहा कि अपने अंदर के आत्म राम को जगाने का उद्यम कर, तभी तेरे अंदर के रावण का अंत हो पाएगा तथा जीवन में परिवर्तन आएगा। मुनि श्री ने कहा अभी तो हर व्यक्ति के अंदर का राम सोया पड़ा है तथा वह उनकी सीता( शांति) का हरण हो रहा है। जाओ और अपने अंदर के सोए हुए आत्मराम को जगाओ तभी आपकी सीता(शांति) वापस मिलेगी। मुनि श्री ने कहा कि आजकल लोग नाम तो राम का लेते हैं और काम रावण के करते हैं तो बताओ काम कैसे बनें? उन्होंने कहा कि अपने अंदर की चेतना को जगाए बिना जीवन का कल्याण नहीं हो सकता। जैसे प्रकृति में दो पक्ष होते है शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष। श्रीराम धर्म नीति और मर्यादा के प्रतीक होकर शुक्ल पक्ष के रूप में हो जो क्रमशः हमारी आत्मा का गुणात्मक विकास कर पूर्णिमा की पूर्ण कलाओं से युक्त होकर चेतना को परिपूर्णता प्रदान करते हैं। वहीं रावण अधर्म, अनीति, और अमर्यादा तथा अन्याय का घोतक है, जो कृष्ण पक्ष का प्रतीक होकर हमारी चेतना को कलुषित कर अंत में हमारे जीवन को कलंकित कर देता है।

 हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है 

मुनि श्री ने कहा कि आज 2 अक्टूबर का दिन है और विश्व में अहिंसा दिवस के रूप में मनाते हुए महात्मा गांधी को याद किया जाता है। उन्होंने कहा कि हिंसा रावण का ही रौद्र रूप है। आज के दिन हम सभी को हिंसा मिटाने के लिए अहिंसा और सहअस्तित्व की भावना को जगाने का प्रयास करना होगा तभी हम संसार को हिंसा मुक्त कर सकते है। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया 4 अक्टूबर शनिवार से बहुप्रतीक्षित श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान प्रारंभ होने जा रहा है जिसमें 1024 अर्घ्य समर्पित करते हुए सिद्ध प्रभु की आराधना की जाएगी।

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