संसार का ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो जिनेंद्र दर्शन से नहीं हो सकता, उनके दर्शन से तो सर्वार्थ सिद्धि संपूर्ण अर्थों की सिद्धि मिलती है एवं कालांतर में हम धीरे धीरे उस मार्ग पर आगे बढ़कर मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। संसार का ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो जिनेंद्र दर्शन से नहीं हो सकता, उनके दर्शन से तो सर्वार्थ सिद्धि संपूर्ण अर्थों की सिद्धि मिलती है एवं कालांतर में हम धीरे धीरे उस मार्ग पर आगे बढ़कर मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं। यह उद्गार आर्यिका विज्ञान मति माताजी ने उदयनगर में चातुर्मासिक धर्म सभा में प्रवचन देते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि व्यक्ति घर में रहते हुए कितने सारे पाप करते रहते हैं और फिर कहते हैं कि हे भगवान हमने इतने पाप किए पता ही नहीं चला।
हे भगवान पाप हो गया, हम पाप करना नहीं चाहते थे मजबूरी वश करना पड़ा अथवा बुद्धिपूर्वक पाप किया। इन तीनों प्रकार पापों में बहुत अंतर है। तीनों के कर्म बंध में भी बहुत अंतर है। कई बार हम हंसते हंसते पाप कर लेते हैं पंचेंद्रिय के विषय भोग करते समय बड़े प्रसन्न होते हैं खुश होते हैं…. लेकिन ध्यान रखना तुम्हारा ये पाप जब उदय में आएगा तब तुम्हारे होंठों पर मुस्कान नहीं होगी। आंखों में सिर्फ आंसू होंगे और चेहरा मायूस होगा और तुम मात्र यही कहोगे कि हमने कोई पाप किया ही नहीं, लेकिन ध्यान रखना अभी का पाप हो या कभी का कभी भी उदय में आ सकता है।
पूर्व कृत कर्म किसी को नहीं छोड़ते
पूर्व कृत कर्म किसी को छोड़ते नहीं। पाप रूपी घड़ा बूंद बूंद करके भर जाता है और जब वो फूटता (उदय) में आता है तो चारों तरफ से पाप (दुःख) की बोछारें होती हैं…चारों तरफ से व्यक्ति परेशान हो जाता है क्योंकि जो पाप किया है उसका फल भोगना ही पड़ेगा। ये पाप तुमने एक ही भव में नहीं किया। फिर किया, फिर किया, फिर किया और इस पाप की संतति को तुम बढ़ाते जा रहे हो। हम अपने वचनों से नहीं कह सकते हैं कि भगवान हमने कितने पाप किए हैं लेकिन इतना विश्वास है कि चिरकालीन पाप की श्रृंखला आपके दर्शन भक्ति करने से और आपके चरणों में बैठकर आलोचना करने से समाप्त हो जाएगी। इतना प्रभाव है जिनेंद्र भगवान की भक्ति का, उनके दर्शन का और उनकी समीपता का। इसलिए हमें देव शास्त्र गुरु की समीपता हमेशा पाना चाहिए और भूलकर भी देव शास्त्र गुरु के अपमान का भाव कभी मन में नहीं लाना चाहिए।
दुर्जन पुरुषों की न करें संगति
माताजी ने कहा कि किसी को भी दुर्जन पुरुषों की संगति नहीं करना चाहिए एवं दुष्टता में साथ नहीं देना चाहिए। इसी प्रकार परिवार,संस्था,समाज में विघटन करने वाले खलनायक भी नहीं बनना तभी तुम सज्जन पुरुष कहलाओगे। माताजी ने आगे कहा कि यदि किसी के जीवन को बना पा रहे हैं तो बहुत अच्छी बात है और अगर नहीं बना पा रहे हैं तो कोई बात नहीं। लेकिन किसी के जीवन को कभी भी बिगाड़ने का प्रयास नहीं करना। सज्जन पुरुष परस्त्री/पर पुरुष पर भी दृष्टि नहीं डालते। परस्त्री की तरफ सिर उठाकर के भी नहीं देखना चाहिए। परस्त्री तुम्हें इस भव में ही नहीं पर भव में भी बर्बाद करने वाली है। इसी प्रकार पराए धन परभी दृष्टि नहीं डालना चाहिए। दूसरों का तो छोड़ो अपने पिता की कमाई पर भी जिसकी दृष्टि है उसे नीतिकारों ने नपुंसक की उपमा दी है।













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