आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में श्री शांतिनाथ जिनालय तख्ता मंदिर में भव्य पंचामृत अभिषेक हुआ। आचार्य श्री के दर्शन हेतु प्रसिद्ध प्रतिष्ठाचार्य पंडित धर्मचंद शास्त्री अष्टापद तीर्थ पधारे। आचार्य श्री एवं संघ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री ने कहा कि वर्षायोग में श्रमण और श्रावक समाज नदी के तटों का चार माह के लिये अपूर्व संगम होता है। समुद्र सिंधु है। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
टोंक। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के सानिध्य में श्री शांतिनाथ जिनालय तख्ता मंदिर में भव्य पंचामृत अभिषेक हुआ। आचार्य श्री के दर्शन हेतु प्रसिद्ध प्रतिष्ठाचार्य पंडित धर्मचंद शास्त्री अष्टापद तीर्थ पधारे। आचार्य श्री एवं संघ के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। आचार्यश्री ने कहा कि वर्षायोग में श्रमण और श्रावक समाज नदी के तटों का चार माह के लिये अपूर्व संगम होता है। समुद्र सिंधु है। नदी रूपी बिंदुओं के योग से यदि एक बिंदु सिन्धु से पृथक जाती है तो सूर्य उसे सुखा देता है। साधु से कटकर रहने वाला समाज और समाज से कटकर रहने वाला साधु दोनों सूख जाएंगे। चातुर्मास दो तटों दो पटरियों को मिलाने वाला अभूतपूर्व दीर्घकालीन त्योहार है।
रथ दो पहियों से चलता है। उसी प्रकार धर्म रूपी रथ साधु और समाज रूपी पहियों से चलता है, नजदीक से साधु-समाज को आपस में विचारों, आचारों का आदान-प्रदान करने का दीर्घकालीन समय वर्षायोग में मिलता है। रथ में दो पहियों को जोड़ने वाली धुरी (एक्सल) होता है। धुरी वर्षायोग के रूप में श्रावक और श्रमण को प्राप्त होती है। साधु के लिए कहा है कि बहता पानी रमता योगी स्वच्छ होता है, लेकिन वर्षाकाल के चार माह में आगम की आज्ञा है। संत विहार न करें, एक जगह रहकर विशेष तप साधना ध्यान-ज्ञान आराधन करें। श्रावक भी चार माह वर्षा में विवाह आदि मांगलिक कार्यों से निवृत्त रहता है, व्यापार-व्यवसाय भी मंद होता है। अतः उसे भी संत समागम से अपने जीवन में सदाचार, नैतिकता, धर्माचरण, स्वाध्याय आदि करने का विशेष अवसर प्राप्त होता है।
साधु संत जीवों की रक्षा के लिए संयम की पालना करते हैं
वर्षाकाल में पानी बरसता है और वर्षायोग में साधु-संतों द्वारा धर्मामृत भी बरसता है। अगर श्रावक इन दिनों में भी प्रमाद का छाता लगाकर रखें तो वह सूखा का सूखा ही रह जाए। अतः वर्षायोग में धर्मामृत से भीगें डरकर भागें नहीं। मंगल देशना देते हुए आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने धर्म सभा आगे कहा कि सनातन परम्परा है कि साधु संत जीवों की रक्षा के लिए संयम की पालना के लिए वर्षायोग में एक स्थान पर रहते है। वर्तमान युग में मंदिर, धर्मशाला, संत भवन आदि में रहकर आत्म साधना करते हैं, श्रावक समाज, साधु संतों की आहार, विहार-निहारादि की व्यवस्था करते हैं। आहारदान वैय्यावृत्ति करने का दीर्घ कालीन अवसर प्राप्त होता है। किसान को अच्छी फसल उगाने के लिए 4 माह होते हैं। यदि वह इन चार माह में चूक गया तो वर्ष भर उसे कुछ प्राप्त नहीं होता है। इसी प्रकार श्रावक को त्याग तपस्या और सेवा के लिए 4 माह होते हैं यदि वह इन चार माह में चूक जाए तो उसके पश्चात कुछ भी हाथ नहीं लगता।
चारों दिशाओं में आने-जाने की सीमा करते हैं
4 माह अमृत वर्षा होती रही, किन्तु आप भौतिकता अज्ञान असंयम की छतरी लगाकर बैठे रहे तो चातुर्मास का कुछ भी फल प्राप्त होने वाला नहीं है। आगम की आज्ञा से बंधे हुए साधु जन चातुर्मास विधि के अनुसार स्थापना करते हैं। चार माह में समाधि, असमाधि का कारण, असंयम की संभावना देखकर चारों दिशाओं में आने-जाने की सीमा करते हैं। श्रावकों में धर्म जाग्रति के अनेक स्चनात्मक, धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। स्वाध्याय के प्रति रुचि उत्पन्न कराते हैं। कार्तिक की अमावस्या में प्रथम प्रहर प्रत्युष काल में वर्षायोग निष्ठान उपवास पूर्वक करते हैं। चातुर्मास आषाढ़ माह के अंतिम दिन से प्रारंभ होकर कार्तिक माह की अमावस्या तक चलने वाले वर्षायोग के ये महीने हमें संकेत देते हैं कि हम आषाढ़ माह में धर्म रूपी बाढ़ लगाकर जीवन रूपी कल्पवृक्ष की सुरक्षा करें।
आसोज में आलस्य को छोड़कर आत्म तत्त्व को जानें
सावन में संयम की साबुन से मन को परम पावन बनाएं भादों में भक्ति के भावों से भगवान की भ्रदता पाएं। आसोज में आलस्य को छोड़कर आत्म तत्त्व को जानें और कार्तिक माह में कर्मठता पूर्वक कर्तव्यों का निर्वाह करें। ऐसा करने से ही चातुर्मास के ये चार महीने हमारे लिए चतुर हितकर मास बन सकते हैं। अन्यथा हमारी नासमझी के कारण यह चार महीने आलस और असंयम में गुजर कर जीवन को व्यर्थ और बेकार भी कर सकते है। वर्षायोग धर्म ज्ञान का सीजन है। अतः इस सीजन का रीजन समझ कर भूले हुई धर्म का रिवीजन करें और सच्चे मार्ग पर चलने का डिसीजन लेकर अपनी पोजीशन बनाएं।













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