अयोध्या में गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ के सान्निध्य में प्रतिष्ठाचार्य ब्रम्हचारी विजय कुमार जैन ने उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि तप मनुष्य जीवन का श्रृंगार है। तप के बिना जीवन अधूरा है और तपस्वी ही उत्तम गति को प्राप्त करता है। पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की ख़ास रिपोर्ट…
अयोध्या। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष श्री अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने जानकारी दी कि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी अपने संघ सहित अयोध्या में विराजमान हैं। इस अवसर पर संघस्थ ब्रम्हचारी एवं प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन ने उत्तम तप धर्म का महत्व बताते हुए कहा कि मनुष्य जन्म पाकर तप करना ही जीवन का सबसे बड़ा श्रृंगार है। उन्होंने कहा कि तप ही वह साधना है जहां परिग्रह का त्याग किया जाता है और कामनाओं का अंत होता है। तप पर्वत की गुफाओं और कठिन परिस्थितियों में रहकर परिषहों को सहन करते हुए किया जाता है। आचार्यों ने तप को बाह्य और आंतरिक, दो भागों में विभाजित किया है।
उसी का जीवन समाज में बनता प्रेरणा का स्रोत
बाह्य तप के छः भेद हैं – अनशन, अवमौदर्य, व्रतपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्त शयनासन और कायक्लेश। वहीं आंतरिक तप के छः भेद बताए गए – प्राश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, व्युत्सर्ग और ध्यान। प्रतिष्ठाचार्य ने कहा कि तप करने वाला ही आत्मा की उन्नति करता है और उसका जीवन समाज में प्रेरणा का स्रोत बनता है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और तप धर्म का संदेश आत्मसात किया।













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