धामनोद (बड़वानी) – परयूषण पर्व के चौथे दिवस को उत्तम शौच धर्म के रूप में मनाया गया। इस दिन भगवान पुष्पदंत का मोक्ष कल्याणक बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। आर्यिका श्री माताजी ने धर्मसभा में बताया कि शौच का अर्थ केवल बाहरी स्वच्छता नहीं बल्कि आंतरिक शुचिता और लोभ का त्याग है। पढ़िए खास रिपोर्ट…
धामनोद // बड़वानी। जैन धर्म का सबसे बड़ा पर्व परयूषण महापर्व देश-विदेश में बड़ी श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। श्रावक-श्राविकाएं तप और त्याग के साथ उपवास, एकाशना और विभिन्न प्रकार के संयम व्रत कर रहे हैं। कोई एक दिन, दो दिन, पाँच दिन, दस दिन, सोलह कारण जी के उपवास कर रहा है तो कोई 32 उपवास कर तपश्चर्या में लीन है।
भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को भगवान पुष्पदंत स्वामी का मोक्ष कल्याणक मनाया गया। माना जाता है कि इस दिन भगवान पुष्पदंत ने सम्मेद शिखर जी से निर्वाण प्राप्त किया था। इस अवसर पर दिगंबर जैन मंदिर में निर्वाण कांड का वाचन किया गया, निर्वाण लाडू चढ़ाए गए, भगवान का अभिषेक, शांतिधारा, पूजन और आरती की गई।धर्मसभा को संबोधित करते हुए आर्यिका विकुंदन श्री माताजी ने कहा कि –
👉 “शौच का अर्थ शुचिता है। बाहर की सफाई के साथ-साथ मन की सरलता और भावों की शुद्धि ही वास्तविक शौच धर्म है। लोभ ही चारों कषायों का जनक है और पाप का मूल कारण है। धन संग्रह जीवन का उद्देश्य नहीं है। परिवार, समाज और धर्म के लिए समय निकालना ही वास्तविक जीवन की उपलब्धि है।”
धन उतना ही कमाओ जितनी आवश्यकता है
उन्होंने आगे कहा कि संतोष रूपी जल से तीव्र लोभ भी मंद पड़ जाता है। धन उतना ही कमाओ जितनी आवश्यकता है। दान करने से वस्तु घटती नहीं बल्कि और बढ़ती है। सिकंदर ने पूरी दुनिया जीत ली थी पर अंत में खाली हाथ ही चला गया। इसलिए शौच धर्म को आत्मसात करो और संतोषी बनकर दान-पुण्य में जीवन लगाओ।” श्रावकों ने दिन भर स्वाध्याय, तप, त्याग और पूजा-अर्चना में समय व्यतीत किया। मंदिरों और धर्म सभाओं में श्रद्धालुओं की बड़ी उपस्थिति रही।













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