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सनावद में पर्युषण पर्व के चौथे दिन सामूहिक पूजन और विधान सम्पन्न : आत्मा के परिणामों की शुद्धता ही है उत्तम शौच धर्म – मुनि साध्य सागर जी


सनावद में पर्युषण पर्व के चौथे दिन उत्तम शौच धर्म की महत्ता पर मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने प्रवचन दिए। इस दौरान पंचामृत अभिषेक, शांति धारा, लड्डू चढ़ाने और सामूहिक पूजन का आयोजन हुआ। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…


सनावद में दसलक्षण पर्व के चौथे दिन का आयोजन श्रद्धा और भक्ति से सम्पन्न हुआ। मुनि श्री साध्य सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि आत्मा के परिणामों में सरलता और शुचिता होना ही वास्तविक शौच है। जब यह शुचिता आत्मा की श्रद्धा से जुड़ती है, तब ‘उत्तम शौच धर्म’ कहलाती है।

उन्होंने बताया कि लोक में शरीर की स्वच्छता को ही शुचिता माना जाता है, परंतु जैन धर्म में परिणामों की शुद्धता को सर्वोपरि माना गया है। यह शुचिता लोभ का त्याग करने पर प्रकट होती है। मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज ने भी प्रवचन में कहा कि “लोभ पाप का बाप है” और इससे बचकर ही आत्मिक प्रगति संभव है।

कल्याणक अवसर पर विशेष लड्डू चढ़ाया

इस अवसर पर सन्मति काका ने जानकारी दी कि प्रतिदिन बड़े मंदिर जी और संत निलय में पंचामृत अभिषेक और सामूहिक पूजन का आयोजन हो रहा है। आज की शांति धारा का सौभाग्य विशाल श्रुति सराफ परिवार को प्राप्त हुआ। साथ ही, भगवान पुष्पदंत के मोक्ष कल्याणक अवसर पर विशेष लड्डू चढ़ाया गया। आदिनाथ छोटे मंदिर में समाजजनों द्वारा दसलक्षण पर्व विधान का आयोजन किया गया, जहां उत्तम शौच धर्म की विशेष पूजन की गई। सभी समाजजन बड़ी संख्या में उपस्थित होकर इस धार्मिक अवसर के साक्षी बने।

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