मुरैना के बड़े जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन मुनिश्री विबोधसागर जी ने उत्तम मार्दव धर्म का महत्व समझाते हुए कहा कि अहंकार आत्मा के पतन का कारण है और विनम्रता ही सच्चा धर्म है। पढ़िए मनोज जैन नायक की खास रिपोर्ट…
मुरैना के बड़े जैन मंदिर में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन जैन संत मुनिश्री विबोधसागर जी महाराज ने उत्तम मार्दव धर्म पर व्याख्यान देते हुए कहा कि संसार में कुछ भी किसी का नहीं है, इसलिए अभिमान और अहंकार त्यागकर विनम्रता धारण करनी चाहिए। उन्होंने कहा—जवानी क्षणभंगुर है, धन बीमारी में नष्ट हो जाता है और रूप एक झटके में समाप्त हो जाता है। अहंकार जीव को नरक और तिर्यंच जैसी दुर्गति की ओर ले जाता है, जबकि विनम्रता आत्मा का स्वभाव है।
मुनिश्री ने कहा कि उत्तम मार्दव धर्म अहंकार का नाश कर सच्ची शांति और सुख प्रदान करता है। धन, बल और पद सब क्षणिक हैं, अतः उनका घमंड व्यर्थ है।
🔹 बड़े जैन मंदिर में धार्मिक आयोजन
दसलक्षण महापर्व के दूसरे दिन पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़े मंदिर में भगवान का अभिषेक, शांतिधारा और पूजन विधान धूमधाम से संपन्न हुए। प्रथम स्वर्ण कलश से अभिषेक का सौभाग्य प्राचार्य अनिल जैन को मिला, जबकि शांतिधारा का अवसर रविंद्र कुमार सौरव जैन, प्रेमचंद पंकज जैन और वंदना साड़ी को प्राप्त हुआ।
दोपहर में मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन कर उसका अर्थ समझाया। शाम को प्रतिक्रमण, शंका समाधान और आरती के बाद विद्वान नीरज शास्त्री ने कहा—“जो जीव जितना झुकता है, उतना ही ऊपर उठता है। अहंकार के कारण रावण जैसे पराक्रमी को भी पराजय का सामना करना पड़ा।”













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