आगरा स्थित शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, आवास विकास कालोनी सिकंदरा में पर्यूषण पर्व के अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म का भव्य आयोजन हुआ। आठों इंद्रों द्वारा भगवान का स्वर्ण कलश से अभिषेक, सामूहिक पूजन, संगीत मय आरती और प्रवचनों के साथ श्रद्धालुओं ने गहन आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त किया। पढ़िए राहुल जैन की रिपोर्टर…
आगरा के शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर, सेक्टर 7 आवास विकास कालोनी सिकंदरा में पर्यूषण पर्व का अंतिम दिन विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का साक्षी बना। दसलक्षण पर्व के दसवें दिन “उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म” का उत्सव मनाया गया, जिसमें भक्तों ने धर्म, संयम और आध्यात्मिक अनुशासन का महत्व आत्मसात किया।
मंदिर परिसर में आठों इंद्रों की बोली लगाई गई, जिसमें सोधर्म इंद्र, ईशान इंद्र और महेंद्र इंद्र की भूमिका में कई श्रद्धालु शामिल रहे। सभी आठों इंद्रों द्वारा भगवान श्री शांतिनाथ जी को पांडुक शिला पर विराजमान कर स्वर्ण कलश से अभिषेक किया गया। इसके बाद सैकड़ों श्रद्धालुओं ने गीले वस्त्रों से सामूहिक अभिषेक किया।
पूजन का वातावरण अत्यंत भक्तिमय रहा। सामूहिक आरती, संगीतमय पूजन और जिन सहस्त्र नाम स्त्रोत व तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन किया गया। हेमा जैन परिवार ने विशेष रूप से निर्वाण लड्डू अर्पित किया। उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने भक्ति-भाव से लड्डू अर्पण किए और सामूहिक निर्वाण कांड की आरती की।
ब्रह्मचर्य आत्मा में लीन होने का मार्ग है
पंडित अंशुल जैन शास्त्री ने अपने प्रवचन में ब्रह्मचर्य धर्म के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य केवल संयम ही नहीं, बल्कि आत्मा में लीन होने का मार्ग है। इन्द्रियों के विषयों से विमुख हुए बिना आंतरिक शांति असंभव है। उन्होंने कहा कि कुशील महापाप है और यह संसार परिभ्रमण का बीज है। ब्रह्मचर्य के पालन बिना तप, त्याग और संयम का कोई मूल्य नहीं। उन्होंने उपस्थित जनों को प्रेरित किया कि इस महापर्व को वर्ष में तीन बार आने पर पूरे उत्साह से मनाने का संकल्प लें।
धर्म और अनुशासन के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई
मंदिर समिति अध्यक्ष राजेश बैनाड़ा, मंत्री विजय जैन निमोरब, कोषाध्यक्ष मगन जैन सहित अनेक पदाधिकारी व सकल जैन समाज बड़ी संख्या में मौजूद रहा। मीडिया प्रभारी राहुल जैन के अनुसार इस आयोजन ने न केवल धार्मिक उत्साह जगाया, बल्कि बच्चों और युवाओं में धर्म और अनुशासन के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई।भक्ति, अनुशासन और आध्यात्मिकता से ओतप्रोत इस आयोजन ने समाज में धर्म और संस्कारों के संवर्धन का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। पूरे आयोजन के दौरान मंदिर परिसर भक्ति भाव और उल्लास से गूंजता रहा और पर्यूषण पर्व का समापन श्रद्धा और अनुशासन के साथ हुआ।













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