दस लक्षण महापर्व के नवें दिन आचार्य वर्धमान सागर जी ने आकिंचन्य धर्म पर प्रवचन देते हुए बताया कि बहिरंग और अंतरंग परिग्रह से मुक्त होकर आत्मा का चिंतन करना ही वास्तविक आकिंचन्य धर्म है। इस अवसर पर 1008 श्री आदिनाथ भगवान का भव्य पंचामृत अभिषेक एवं शांति धारा सम्पन्न हुई। पढ़िए राजेश पंचोलिया की खास रिपोर्ट…
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने दस लक्षण पर्व के नवें दिन अपने मंगल प्रवचन में कहा कि बहिरंग और अंतरंग परिग्रह से मुक्त होकर आत्मा का चिंतन करना ही आकिंचन्य धर्म है। उन्होंने कहा कि “मैं अकेला हूं, आत्मा ही सत्य है, यह देह मेरा नहीं है” ऐसा चिंतन करने से आत्मा निर्मल और स्वच्छ होती है। आचार्य श्री ने बताया कि वर्षों पूर्व 26 प्रतिमाओं का प्रकट होना हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता और बुद्धिमता का परिचायक है। विधर्मियों और आतताइयों से प्रतिमाओं को सुरक्षित रखने हेतु उन्हें भूमिगत किया गया था। यह आज भी भगवान आदिनाथ के चमत्कार और भक्तों की भक्ति का परिणाम है।
राजेश पंचोलिया के अनुसार, 9 का अंक अक्षय अंक है जो परिग्रह से निवृत्ति और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक है। दस बहिरंग और चौदह अंतरंग परिग्रहों का त्याग ही आकिंचन्य धर्म है, जिससे आत्मा दर्पण के समान स्वच्छ हो जाती है।
इस अवसर पर 1008 श्री आदिनाथ भगवान का भव्य पंचामृत अभिषेक आयोजित हुआ। चयनित पुण्यार्जक परिवारों ने जल, दूध, दही, घी, शर्करा, औषधियों, केसर, चंदन एवं पुष्पों से भगवान का अभिषेक किया। शांति धारा और मंगल आरती के दौरान भक्तजन भक्ति नृत्य द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त कर रहे थे।
धार्मिक अनुष्ठान, भक्ति का आयोजन
शाम को श्रीजी इंद्रध्वज मंडल, आचार्य श्री की आरती और संघ के मुनि श्री हितेंद्र सागर जी, श्री ध्येय सागर जी, आर्यिका चैत्यमति श्री, आर्यिका दर्शनामति श्री, आर्यिका जिनेशमती श्री तथा श्राविकाओं के सान्निध्य में भक्ति का आयोजन हुआ।
इस अवसर पर उपवासधारी श्रावक-श्राविकाओं की अनुमोदना हुई और रात्रि में संपूर्ण समाज ने भक्ति भाव से तपस्वियों का उत्साहवर्धन किया। प्रभावना जयपुर से पधारी सुनीता शाह द्वारा वितरित की गई।













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