अयोध्या में विराजमान गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माताजी के ससंघ ब्रह्मचारी प्रतिष्ठाचार्य विजय कुमार जैन ने उत्तम आर्जव धर्म पर प्रवचन देते हुए कहा कि मन, वचन और काय की एकरूपता ही आर्जव है। मायाचारी से भरा व्यक्ति नरक और तिर्यंच गति का द्वार खोलता है, जबकि सरलता मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है। पढ़िए अभिषेक अशोक पाटील की ख़ास रिपोर्ट…
अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील, कोल्हापुर ने बताया कि गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ससंघ अयोध्या में विराजमान हैं। इस अवसर पर संघस्थ ब्रह्मचारी प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय कुमार जैन ने अपने प्रवचन में कहा कि –
“उत्तम आर्जव-रीति बखानी, रंचक दगा बहुत दुःखदानी।
मनमें होय सो वचन उचरिये, वचन होय सो तनसौं करिये।”
मन में सरलता का भाव ही आर्जव धर्म को प्रकट करता
उन्होंने बताया कि मन में सरलता का भाव ही आर्जव धर्म को प्रकट करता है। मायाचारी और कपट से भरा व्यक्ति न केवल दीर्घकालीन प्रसिद्धि से वंचित रहता है बल्कि नरक और तिर्यंच गति की ओर अग्रसर हो जाता है। मन, वचन और काय की एकरूपता ही आर्जव धर्म का मूल है। सरल व्यक्ति से हर कोई जुड़ना चाहता है जबकि कपटी व्यक्ति से सब दूर हो जाते हैं।
विजय कुमार जैन ने कहा कि उत्तम गति प्राप्त करने के लिए सरलता अत्यंत आवश्यक है, यही मोक्ष का द्वार खोलती है। उन्होंने दोहा सुनाते हुए कहा –
“ऋजु भाव कहा आर्जव उत्तम, मन वच ओ काय सरल रखना।
इन कुटिल किये माया होती, तिर्यंचगति के दुःख भरना।” इस प्रकार आर्जव धर्म को जीवन में उतारकर साधक मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो सकता है।













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