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आदिकुमार के वन गमन पर हुई आंखें नम : स्व को जानने के लिए ज्ञान का उपयोग करो, इन्द्रिय का नहीं – मुनि सुधासागर 


यशोदय तीर्थ स्थल पर चल रहे मुनिश्री सुधासागर महाराज एवं क्षुल्लक गम्भीर सागर के सानिध्य में भव्य पंचकल्याणक महोत्सव एवं चौबीस समवशरण विधान में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। मुनिश्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। पढ़िए राजीव सिंघई की रिपोर्ट…


महरौनी (ललितपुर)। यशोदय तीर्थ स्थल पर चल रहे मुनिश्री सुधासागर महाराज एवं क्षुल्लक गम्भीर सागर के सानिध्य में भव्य पंचकल्याणक महोत्सव एवं चौबीस समवशरण विधान में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। मुनिश्री सुधासागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वप्न देखते ही डर जाते हैं ये क्या है। आपका अनुभव कह रहा है कि ज्ञान टंच नहीं करता है। सम्मेद शिखर की वंदना कर रहे हैं ना, आप सम्मेद शिखर गये नहीं, वंदना की फिर भी आपको पुण्य का बंध हो रहा है। कोई बड़ी बात नहीं है, बस ज्ञान का विषय बना लें। ज्ञेय की अनुभूति नहीं होती, आत्मा जब भी अनुभव करना चाहे ज्ञेय का अनुभव कर सकती है। आत्मा का अनुभव नहीं कर सकती। तुम खुद अपनी आत्मा का अनुभव कर सकते हो। मुझे आत्मा जानना है तो कैसे जानूं प्रश्न कठिन है। मुझे परमात्मा को जानना है, ये सरल है। आप जान सकते हैं। पुण्य कब-हम सपने में सम्मेद शिखर की वंदना कर रहे हैं लेकिन सो रहे हैं। पुण्य शिखर जी की वंदना करने का लग रहा है। हम सो रहे हैं आत्मा अरुपी है।

आत्मा को नहीं, परमात्मा को जानें

मुनि सुधासागर ने कहा कि आत्मा जानना है कैसे जानना है। हमें परमात्मा को जानना है। अध्यात्मवादियों पूजा करने में मन नही लगता है। अपने स्वयं के बगीचे के फल अच्छे हैं। बाजार में जाकर खरीदना कठिन है। प्रमादी लोग अध्यात्म ज्यादा पसंद करते हैं। आलसी लोगों को कुछ करना ना पड़े, अध्यात्मवादी का पूजन पाठ करने में आलस्य करते हैं। हमारी मन स्थिति-लाइब्रेरी बहुत सारी पुस्तकें रखी रहती हैं, एक पुस्तक दस हजार रुपए है और बहुत सारी पांच रुपए वाली पुस्तकें भरी हुई हैं। सच बताना आपका मन किस पुस्तक को देखने का होगा। आप सोचेंगे पांच रुपए की पुस्तक में क्या रखा है जो पुस्तक दस हजार रुपए की है वह विशेष होगी। बड़े आदमी सब्जी खरीदने जायेंगे तो महंगी सब्जी खरीद कर खुश होते हैं। वे समझते हैं कि महंगा माल बहुत अच्छा है जबकि सब्जी वाले ने उसी टोकरी से कुछ टमाटर छाटकर अलग रख दिए। ये है हमारे मन की स्थिति है हम अच्छे बुरे की पहचान पैसे से करना चाहते हैं, गुणों से नहीं। अच्छे-बुरे की पहचान गुणों से होती है।

ज्ञान से जानो

उन्होंने कहा कि ज्ञान-जब स्व को जानता है तो ज्ञान का उपयोग करो, इन्द्रिय का नहीं। जहां-जहां अपनापन लगे, उन्हें इन्द्रिय से नहीं ज्ञान से जानो। आंखों से जो देख रहा हूं उसे ज्ञान से देखना है। ज्ञेय का अनुभव-भगवान गुरु शास्त्रों में ने कहा ये हैं मन इन्द्रियों को सहारा नहीं लेना। हमें अपना ज्ञान करना है। सम्यक दृष्टी ज्ञान का अनुभव होता है ज्ञेय का नहीं, ज्ञेय का अनुभव अरिहंतों सिद्धों में होता है, छद‌मस्थ को ज्ञान का अनुभव होता है। भगवान जैसा अनुभव करते हैं जैसा हमें भी अनुभव हो है। हमें ज्ञान से अनुभव होता है, ज्ञेय का अनुभव भगवान को होता है।

मनाया गया पंचकल्याणक महोत्सव

भव्य पंचकल्याणक महोत्सव में तपकल्याणक के दिन नाभिराय का दरबार, युवराज आदिकुमार का विवाह, आदिकुमार का राज्याभिषेक, 32000 मुकुटबद्ध द्वारा संचालन, षट्कर्म शिक्षा, ब्रह्ममी सुंदरी विद्यादान आदि संसारिक व्यवस्था, नीलाजंना नृत्य, आदिकुमार का वैराग्य, लोकातिक देवों का आगमन, आदिकुमार का पुत्र भरत बाहुबली को राज्य सौंपना, सुदर्शन नायक पालकी का आरूण होकर प्रस्थान, दीक्षावन की ओर प्रस्थान, अकन्यास संस्कार रोपण पूजन की क्रियाएं और प्रस्तुति की गयी।

इन्हें मिला सौभाग्य

मुनिश्री सुधासागर महाराज को पडगाहन करने का सौभाग्य महेंद्र विजय सिंघई और क्षुल्लक गम्भीर सागर महाराज को आहार देने का सौभाग्य जिनेंद्र खजुरिया परिवार को प्राप्त हुआ।

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